पुरखों ने हमें सरोवर सौंपा था, हम तुम्हारी पीढ़ी को समाधि सौंप रहे हैं। कभी मन करे तो यहां आकर एक फूल फेंक जाना। यह ताल-महल है, कभी इसमें जल का राजा रहता था!
पुरखों से सुना है कि रुद्रसागर में कभी जल रहता था। ताल एक महल था और जल उसका राजा होता था। लहरें उस राजा की रानियां थीं। जल-जीव, नौकर-चाकर, पेड़-पहरेदार और पंछी चारण-भाट! जल राजा महाकाल का भक्त था। महाकाल का भक्त होने से दान में दाताओं का दाता और अपेक्षा के नाम पर आशुतोष। महाकाल की तरह ही प्रजापालक था और अच्छे गृहस्थ की भांति कर्तव्य परायण। वह संतों-सा निःस्वार्थ, निःस्पृह और निर्मल था तो देवताओं-सा दिव्य!
उसके विस्तृत राजप्रासाद में सदा सबका स्वागत था। घर मंगल कामनाओं से इतना मालामाल था कि खुशियों के नित नए कमल मुस्काते थे। जमाने भले करवटें बदलते रहे, पर जल-जहांपनाह का जलवा कायम रहा। पीढ़ियां गवाह हैं। पूछ लीजिए, आज भी पचास प्रमाण बता दंेगी। जब तपस्वी गृहणियां पर्वों पर पकवान बनाने के लिए रुद्रसरोवर से घड़े भरकर ले आती थीं! अस्सी के सिंहस्थ से पहले तक सागर का साम्राज्य आबाद था और जल जिंदाबाद के जयकारों से तीर्थ गूंजता रहता था।
पहली बार तब जल को देस बेगाना लगा जब साल अस्सी के सिंहस्थ की कवायद में सरकारी अमला मानो कुर्की के इरादे से पहुंचा। समय ही नहीं, लोग भी बदल गए थे। वे जल के रक्षक नहीं, उसकी जमीन के भक्षक थे। वे पुराणों की जगह फाइलें लिए आए थे। बीच सागर में नाला खींच गए। वह सागर में जल-राज के पतन की पहली पापपूर्ण पहल थी। उस रात राजा इतना रोया कि घर आंसुओं से भर गया। उपहास और उपेक्षा ने उसमें ऐसी उदासी भरी कि सबका भर्ता भर्तृहरि बन निकल पड़ा।
रुद्रसरोवर का जल जोगी हो गया! बरसों बाद तक उसके आंसुओं की नमी से टूटे घरौंदे के कीचड़ में यादों के कमल खिलते रहे। अपने बालपन की अच्छे से याद है, जब भारती भवन से भुजंगासन में झुकी सड़क से उतरते हुए बड़े गणपति तक आते ही माता-पिता मुझे किनारे से बीच में ले लेते थे कि कहीं गिर न जाऊंं! हरसिद्धि की राह में ठिठकते और मुझे कहते, 'देख! कमल का फूल।'
मेरे पिता ने उसमें जलज देखे थे, मेरे नसीब में पंकज आए। जैसे-जैसे मैं बढ़ता गया, सरोवर में जल के आंसू भी सूखते गए। जल को जलाकर जमीन जीतने वालों ने मेरी आंखों के सामने कीचड़ को पाटकर किनारों की बंदरबाट कर ली। मैं देखता रह गया! कुछ न कर सका। सर्व साधारण सागर को बाहुबलियों की भुजाओं में समाते बेबस ताकते रहे!
बरसात में जब कभी जोगी-जल चातुर्मास के लिए तीर्थ आया और उसने अपने पुराने घर की ड्योढ़ी पर दीप धरे, तो सहज ही रह-रहकर रुद्रसागर रोशन होता रहा। जल ज्योति से जगमग! लेकिन पिशाचों का पेट अभी भरा न था। कभी संरक्षण करने के नाम पर तो कभी सौंदर्यीकरण के बहाने हर बार सिंहस्थ में वे आते रहे।
अब विकास के नाम पर सरकारी शिलालेख और कब्जाधारियों के मालिकाना हक की तख्तियां ही बची हैं। पुरखों ने हमें सरोवर सौंपा था, हम तुम्हारी पीढ़ी को समाधि सौंप रहे हैं। कभी मन करे तो यहां आकर एक फूल फेंक जाना। यह ताल-महल है, कभी इसमें जल का राजा रहता था!