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जिस व्रत से मिला नारद को विष्णु भक्ति का वरदान

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ज्येष्ठ माह के शुक्लपक्ष की एकादशी को 'अपरा' और 'निर्जला' एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। पद्म पुराण के अनुसार इस एकादशी को निर्जल व्रत रखते हुए विष्णु की पूजा- पाप तापों से मुक्त कर देती है।
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पुराणकथा के अनुसार देवर्षि नारद ने ब्रह्मा के कहने पर इस तिथि पर निर्जल व्रत किया। हजार वर्ष तक 'निर्जल' व्रत करने पर उन्हें चारों तरफ नारायण ही नारायण दिखने लगे। उन्हें भगवान श्रीविष्णु का दर्शन हुआ, नारायण ने उन्हें अपनी निश्छल भक्ति का वरदान दिया। तभी से निर्जल व्रत शुरु हुआ।

निर्जला एकादशी व्रत का महत्व

एकादशी स्वयं विष्णु प्रिया है इसलिए मानते हैं कि इस दिन निर्जल व्रत जप-तप पूजा पाठ करने से प्राणी श्रीविष्णु का सानिध्य प्राप्त कर जीवन-मरण के बंधन से मुक्त हो जाता है। सभी देवता, दानव, नाग, यक्ष, गन्धर्व, किन्नर, नवग्रह आदि के जरिए रक्षा और विष्णु भक्ति के लिए एकादशी का व्रत रखने के कारण इसे देव 'व्रत' भी कहा जाता है।

पौराणिक मान्यता है कि एकादशी में ब्रह्महत्या सहित समस्त पापों को शमन करने की शक्ति होती है। इसदिन किसी भी तरह के वर्जित कर्म से बचना चाहिए। वैवस्वत मन्वंतर के अट्ठाईसवें द्वापर में शिव के अंशावतार महर्षि व्यास ने पांडवों को निर्जला एकादशी के व्रत के महत्व को बताया था।
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खूब खाने वाले भीम, आखिर क्यों यह एकादशी व्रत रखते थे

जब वेदव्यास ने पांडवों को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष देने वाले एकादशी व्रत का संकल्प कराया तो भीम ने पूछा कि देव, मेरे पेट में 'वृक' नाम की जो अग्नि है, उसे शांत रखने के लिए कई बार भोजन करना पड़ता है।

तो क्या अपनी उस भूख के कारण मैं एकादशी जैसे पुण्यव्रत से वंचित रह जाउंगा? महर्षि व्यास ने कहा कि तुम केवल निर्जला एकादशी का व्रत करो। इससे तुम्हें वर्ष की समस्त एकादशियों का फल प्राप्त होगा।

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