हिंदू धर्म में देवी शक्ति के विविध रूपों की पूजा-आराधना का विशेष महत्व है। देवी सती के अंगों के पृथ्वी पर गिरने से अनेक शक्तिपीठों की स्थापना हुई। इन्हीं पावन शक्तिपीठों में से एक है कात्यायनी या उमा शक्तिपीठ, जो उत्तर प्रदेश के वृंदावन धाम में स्थित है। नवरात्रि के छठे दिन विशेष रूप से देवी कात्यायनी की पूजा की जाती है। धार्मिक मान्यता है कि यहां सच्चे मन से मांगी गई हर प्रार्थना अवश्य पूर्ण होती है।
देवी सती के केश गिरने से स्थापित हुआ शक्तिपीठ
पौराणिक कथाओं के अनुसार, प्रजापति दक्ष के यज्ञ में अपमानित होकर देवी सती ने अग्निकुंड में अपने प्राण त्याग दिए थे। इसके बाद भगवान शिव ने उनके शरीर को लेकर तांडव किया। तब भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से उनके शरीर के 51 अंगों को विभाजित किया। जहां-जहां ये अंग गिरे, वहां शक्तिपीठों की स्थापना हुई। वृंदावन स्थित इस शक्तिपीठ पर देवी सती के केश गिरे थे।
राधा रानी द्वारा की गई देवी की पूजा
धार्मिक मान्यता है कि इस स्थल पर राधा रानी ने अन्य गोपियों के साथ देवी उमा की आराधना की थी। उन्होंने यह पूजा भगवान श्रीकृष्ण को पति स्वरूप पाने की इच्छा से की थी। देवी ने राधा रानी सहित सभी गोपियों को आशीर्वाद दिया। इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण ने वृंदावन की गोपियों के साथ महारास रचाया। श्रीमद्भागवत में इस प्रसंग का उल्लेख मिलता है।
भगवान श्रीकृष्ण का पूजन और कंस वध
एक मान्यता यह भी है कि इसी स्थान पर भगवान श्रीकृष्ण ने देवी की बालू की मूर्ति बनाकर पूजा की थी। इस पूजन के बाद ही उन्होंने मथुरा के अत्याचारी राजा कंस का वध किया और धर्म की स्थापना की। इस प्रकार यह स्थान न केवल देवी शक्ति बल्कि श्रीकृष्ण लीला से भी जुड़ा हुआ है।
वर-वधु की प्राप्ति के लिए प्रसिद्ध स्थल
कात्यायनी शक्तिपीठ के दर्शन का विशेष महत्व माना जाता है। यहां आने वाले भक्त अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए प्रार्थना करते हैं। मान्यता है कि विशेषकर अविवाहित युवक-युवतियां नवरात्रि के अवसर पर यहां दर्शन कर मनचाहा वर या वधु प्राप्त करने का आशीर्वाद पाते हैं। सच्चे मन से की गई प्रार्थना यहां शीघ्र ही पूरी हो जाती है।
मंदिर की भव्यता और स्वरूप
स्वामी केशवानंद द्वारा बनवाया गया यह मंदिर अपनी भव्यता के लिए भी प्रसिद्ध है। मंदिर में माता की अष्टधातु की प्रतिमा विराजमान है, जो अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित है और जिन पर लाल चुन्नी ओढ़ाई गई है। संगमरमर से बने इस मंदिर के मुख्य द्वार पर सुनहरे रंग के दो शेर स्थापित हैं। मंदिर के गुंबद पर दो त्रिशूल और माता का ध्वज लहराता है। यद्यपि समय-समय पर मंदिर का जीर्णोद्धार हुआ है, किंतु इसका प्राचीन स्वरूप अब भी संरक्षित है।