नवरात्रि महाशक्ति देवी दुर्गा की आराधना का पर्व होता है। 17 अक्तूबर से शारदीय नवरात्रि आरंभ हो रहे हैं। शास्त्रों के अनुसार महाशक्ति ही परम ब्रह्म परमात्मा है। इनके विविध स्वरुप हैं जो अनेकों रूपों में विभिन्न लीलाएं करती हैं। भारतवर्ष में शक्ति साधना के कुछ विशेष पावन स्थल हैं जो शक्तिपीठ के नाम से जाने जाते हैं। मां ज्वाला देवी का मंदिर हिमाचल प्रदेश में कांगडा घाटी से 30 किमी दक्षिण में स्थित है। यह मंदिर देवी के 51 शक्ति पीठों में से एक है। इस मंदिर को जोता वाली का मंदिर और नगरकोट भी कहा जाता है।
माना जाता है कि इस मंदिर की खोज पांडवों ने की थी। भगवान शंकर के तांडव नृत्य के दौरान उनके कंधे पर रखे माता सती के शव को सृष्टि की रक्षा हेतु भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से 51 टुकड़े कर दिए। देवी के शरीर के अंग जहां जहां गिरे वहां शक्ति पीठ बन गया। मान्यता है कि ज्वालाजी में माता सती की जीभ गिरी थी इसलिए इस स्थान को शक्ति पीठ की मान्यता मिली।
यहां देवी भगवान शिव के साथ हमेशा निवास करती हैं। यहां माता सती 'सिद्धिदा अम्बिका' तथा भगवान शिव 'उन्मत्त' रूप में विराजित है। सबसे पहले इस मंदिर का निर्माण राजा भूमि चंद के करवाया था। बाद में महाराजा रणजीत सिंह और राजा संसारचंद ने 1835 में इस मंदिर का पुनरुद्धार करवाया।
ऐसे प्रकट हुईं जोता वाली मां
इस मंदिर का इतिहास बहुत प्राचीन है। ज्वाला जी मंदिर में देवी के दर्शन ज्योति रूप में होते है। पौराणिक मान्यता है कि गोरखनाथ नाम का मां का एक अनन्य भक्त था। एक बार उन्हें भूख लगी तब उन्होंने भवानी मां से कहा कि आप आग जलाकर पानी गर्म करें, तब तक मैं भिक्षा मांगकर लाता हूं। देवी मां ने आग जलाकर पानी गर्म करके अपने भक्त गोरखनाथ का इंतज़ार करने लगी पर वे आज तक लौट कर नहीं आए। माना जाता है कि गोरखनाथ की प्रतीक्षा में मां आज भी ज्वाला जला कर बैठी हैं।
मान्यता है कि जब कलियुग का अंत होगा और सतयुग आएगा तब गोरखनाथ लौटकर मां के पास आएंगे। तब तक यह ज्योति इसी प्रकार यहाँ जलती रहेगी। इस जोत जलाए रखने के लिए घी और तेल की जरुरत नहीं होती है। मंदिर के अंदर माता की नौ ज्योतियां है जिन्हें, महाकाली, अन्नपूर्णा, चंडी, हिंगलाज, विंध्यावासनी, महालक्ष्मी, सरस्वती, अम्बिका, अंजीदेवी के नाम से जाना जाता है। ज्वाला जी मंदिर के पास ही गोरखनाथ नाथ का मंदिर है जिसे गोरख डिब्बी के नाम से जाना जाता है। इस स्थान पर एक आश्चर्यजनक जल कुंड है जिसका पानी देखने पर उबलता हुआ लगता है पर छूने पर एकदम ठंडा होता है।
बादशाह अकबर का अभिमान हुआ भंग
बादशाह अकबर ने इस मंदिर की आस्था के बारे में सुना तो वह अचंभित हो गया। वह अपनी सेना के साथ खुद मंदिर की तरफ चल पड़ा। मंदिर में निरंतर जलती हुई ज्वालाओं को देखकर उसके मन में शंका हुई और उसने मंदिर में जल रही ज्वालाओं पर पानी डालकर बुझाने के आदेश दिए। लाख कोशिशों के बाद भी अकबर की सेना मंदिर की ज्वालाओं को बुझा नहीं पाई। अकबर को मां की शक्ति का एहसास हुआ। उसने देवी मां की अपार महिमा को देखते हुए सवा मन (पचास किलो) सोने का छत्र देवी मां के दरबार में चढ़ाया, लेकिन माता ने वह छत्र स्वीकार नहीं किया और वह छत्र गिर कर किसी अन्य पदार्थ में परिवर्तित हो गया। आज भी बादशाह अकबर का चढ़ाया हुआ यह छत्र ज्वाला देवी के मंदिर परिसर में रखा हुआ है।