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नवरात्रि 2018 : दैवीय संपदा पाने के लिए ऐसे करें आराधना

Thu, 11 Oct 2018 11:14 AM IST
डॉ. प्रणव पण्ड्या
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navratri puja 2018
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ऋषियों ने आध्यात्मिक विकास के लिए नवरात्रि को सर्वोत्तम अवसर बताया है। इन दिनों जप, तप से अंतस् की ऊर्जा बढ़ती है। आध्यात्मिक विकास होता है। इस ऊर्जा को कार्य रूप में परिणत करने से उसमें और निखार आता है। इसी को आराधना कहते हैं। आराधना कहते हैं- समाजसेवा को, जन कल्याण को। सेवाधर्म वह नकद धर्म है, जो हाथों हाथ फल देता है। इसमें पहले बोना पड़ता है। जिस भाव से जितना बोया जायेगा, उसी अनुसार वह कई गुना होकर वापस मिलता है। जिस तरह उर्वर खेत में मक्का, ज्वार, गेहूँ आदि की फसल हमें देता है।
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सच्ची आराधना
श्रेष्ठ उद्देश्यों के लिए निःस्वार्थ भाव से की गयी सेवा सच्ची आराधना माना गया है। आराधना जनकल्याण से जुड़ा होना चाहिए और व्यवहार में पुण्य परमार्थ के पुरुषार्थ की प्रचुर भावना होनी चाहिए। तभी आराधना का सर्वोत्कृष्ट फल प्राप्त हो पाता है।

बढ़ती है दैवी संपदा आराधना से
आराधना उदार सेवा साधना से ही सधती है। सेवा कार्यों में सामान्यतः वे सेवायें हैं जिनसे लोगों को सुविधाएँ मिलती हैं। श्रेष्ठतर सेवा वह है जिससे किसी की पीड़ा का, अभावों का निवारण होता है। श्रेष्ठतम सेवा वह है जिससे व्यक्ति पतन से हटकर उन्नति की ओर मोड़ा जा सके। सुविधा बढ़ाने और पीड़ा दूर करने की सेवा तो कोई आत्मचेतना संपन्न ही कर सकता है। यह सेवा भौतिक संपदा से नहीं, दैवी संपदा से की जाती है। दैवी संपदा देने से घटती नहीं, बढ़ती है। इसलिये भी वह सर्वसुलभ और श्रेष्ठ मानी जाती है।
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आराधना अर्थात् उर्वर खेत में बोना
शरीर, बुद्धि और भावना-ये तीन चीजें जो भगवान् ने दी हैं। यह तीन शरीर-स्थूल सूक्ष्म और कारण के प्रतीक हैं। इसमें तीन चीजें भरी रहती हैं- स्थूल में श्रम, समय। सूक्ष्म में मन, बुद्धि। कारण में भावना। इसके अलावा जो चौथी चीज है, वह है धन-संपदा जो मनुष्य कमाता है। इसे भगवान् नहीं देता है। भगवान् न किसी को गरीब बनाता है, न अमीर। यह सब उनके पूर्व जन्मों द्वारा अर्जित कर्म का फल है। जो शक्ति या संपदा पास हो, उसे भगवान के खेत में बो दें, फिर उसका प्रतिफल अनेक गुना होकर वापस मिलता है। अर्थात् जो कुछ भी करना हो, इसी समग्र सृष्टि के लिए करना चाहिए। यही भगवान् की वास्तविक पूजा कहलाती है। इसे ही आराधना कहते हैं।

शक्ति आराधना की बेला
नवरात्रि की बेला शक्ति आराधना की बेला है। माता के विशेष अनुदानों से लाभान्वित होने की बेला है। अपनी साधना तपस्या द्वारा अपने बाह्य एवं अंतर को साफ-सुथरा कर लें। हम चाहें या न चाहें परिवर्तन तो होना ही है, सृष्टि की संचालिनी शक्ति इस विश्व-वसुन्धरा के कल्याण के लिए कटिबद्ध है। आत्म सुधार कर हम भी उसके उद्देश्य में सहयोगी बनें।
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लेखक - अखिल विश्व गायत्री परिवार प्रमुख व देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के कुलाधिपति हैं।
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