सृष्टि के आरंभ के समय से ही श्रावण मास की शुक्लपक्ष की पंचमी तिथि को नागपंचमी के रूप में मनाया जाता रहा है। तिथियों के स्वामी सूर्य ने यह तिथि नागों के लिए निर्धारित की है।
महर्षि दुर्वासा के श्राप से जब तीनों लोक श्रीहीन हो गए तब महादेव की आज्ञा से समुद्र मंथन का कार्य आरम्भ हुआ जिसमे नागों के राजा वासुकि का प्रयोग रस्सी के रूप में किया गया।
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समुद्र मंथन से निकले ′कालकूट′ विष को गले में धारण कर शिव ने सृष्टि का विनाश होने से बचाया। विषग्राही भगवान् शिव के गले में लिपट कर कालकूट विष के दाहकत्व को कम करते हुए ′अनंत′ नामक नाग हार के रूप सुशोभित होते हैं। ये मानव शरीर में मूलाधार चक्र से सहस्रासार चक्र तक मेरुदंड स्वरूप हैं।
इनकी पूजा-अर्चना से कालसर्प दोष, अकाल मृत्यु, और विषधर जीवों के दंश का भय नहीं रहता। नागपंचमी को अष्टनागों की पूजा की जाती है।
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ये ग्रह के समाज तेजस्वी है। इनमें अनन्त नाग सूर्य, वासुकि चंद्रमा, तक्षक भौम, कर्कोटक बुध, पद्म बृहस्पति, महापद्म शुक्र, कुलिक और शंखपाल शनि ग्रह के रूप हैं। नागों के कई स्वरूप है। उनकी विधिवत पूजा कल्याणकारी है।