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इस तीर्थ में मिलता है एक साथ सभी तीर्थों की यात्रा का पुण्य

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आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन भगवान विष्णु सोने चले जाते हैं। इसके साथ ही चतुर्मास शुरू हो जाता है। इस चतुर्मास का अंत कार्तिक शुक्ल एकादशी यानी देवप्रबोधनी के दिन होता है। इस दिन भगवान विष्णु जगते हैं। इन चार महीनों में अगर आप किसी तीर्थ यात्रा पर जाने की सोच रहे हैं तो अपने विचार बदल दीजिए।
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कारण यह है कि इन दिनों किसी भी तीर्थ की यात्रा करने पर आपको तीर्थयात्रा का पुण्य नहीं मिलेगा। अगर आप तीर्थयात्रा से पुण्य पाना चाहते हैं तो बस एक तीर्थ ऐसा है जहां जाने पर सभी तीर्थों की यात्रा का पुण्य एक साथ मिल जाएगा।

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फिर असली तीर्थराज कौन?

इस तीर्थ का नाम है ब्रजधाम। इसका कारण यह है कि एक समय भगवान विष्णु ने प्रयागराज को सभी तीर्थों का राजा घोषित कर दिया। तीर्थों का राजा बनते ही प्रयाग को अभिमान हो गया। प्रयाग का अभिमान दूर करने के लिए एक दिन नारद जी तीर्थराज के पास गए और बोले कि आपको तीर्थराज बना तो दिया है लेकिन आप वास्तव में तीर्थराज नहीं हैं।

नारद की बात सुनकर तीर्थराज ने सारे तीर्थों को अपने यहां आमंत्रित किया। प्रयाग के बुलाने पर सारे तीर्थ इकट्ठा हुए लेकिन ब्रज उपस्थित नहीं हुआ। इस पर तीर्थराज प्रयाग नाराज हुए और ब्रज पर सभी तीर्थों को लेकर आक्रमण कर दिया।
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इसलिए सभी तीर्थ रहते हैं ब्रज में

तीर्थराज को हार का मुंह देखना पड़ा। इसके बाद तीर्थराज सभी तीर्थों को लेकर भगवान शिव, विष्णु, ब्रह्मा के पास गए और आप बीती सुनाई। इस पर भगवान विष्णु ने तीर्थराज प्रयाग को समझाया कि ब्रज पर आक्रमण करने वाले की हार निश्चित है।

विष्णु ने कहा ब्रज हमारा घर है और तुमने हमारे घर पर चढ़ाई की है। इसके पश्चाताप भगवान विष्णु ने सभी तीर्थों को चार माह तक ब्रज में रहकर प्रायश्चित करने का आदेश दिया।

तभी से सारे तीर्थ देवशयनी एकादशी से लेकर देवप्रबोधनी एकादशी तक ब्रज में निवास करते हैं। इस दौरान जो भी भक्त ब्रजधाम की यात्रा करता है उसे सभी तीर्थों का पुण्य प्राप्त हो जाता है।

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