अस्तित्व की प्रकृति दो ध्रुवों के बीच में होती है। इसका मतलब यह नहीं है कि एक ध्रुव दूसरे के खिलाफ है या कोई एक दूसरे से ऊपर है। यह अपनी पहचान से जुड़ा मुद्दा है। अगर आपकी पहचान एक नारी के तौर पर है, तो लगता है कि स्त्रैण प्रकृति रचनात्मक होती है। अगर पहचान पुरुष के तौर पर है तो लगता है कि पुरुष ही सबसे बेहतर है और पुरुष इसी सोच के आधार पर खड़े हो जाते हैं। लेकिन दोनों दो अलग-अलग चीजें नहीं है, एक ही सत्ता के दो हिस्से हैं। जब आप भौतिक आयाम से परे चले जाते हैं, तो स्त्री या पुरुष होना मायने नहीं रखता।
स्त्री या पुरुष के रूप में आपकी पहचान सिर्फ भौतिक अस्तित्व तक है, लेकिन इससे कुछ तय नहीं होता। जीवन में किसी मोड़ पर इसमें बदलाव भी हो सकता है। किसी खास मोड़ पर हो सकता है कि आप काफी स्त्रैण हो, लेकिन धीरे-धीरे आपने पुरुष प्रकृति को अपना लिया। आप पहले बेहद पुरुषार्थी हों और किसी मोड़ पर कुछ ऐसी समझ खिल गई कि भीतर स्त्रैण प्रकृति विकसित हो गई।
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लेकिन दोनों कभी एक-दूसरे की विरोधी नहीं हो सकते। औरत और मर्द आपस में लड़ सकते हैं। स्त्रियां और पुरुष आपस में भी लड़ सकते हैं। यानी लड़ाई स्त्रैण व पुरुष प्रकृति के होने से नहीं है। दोनों के बीच एक दूसरे के दायरे में घुसने से होती हैं। इसके मौके ज्यादा होते हैं, इसलिए लड़ाई भी ज्यादा होती है। झगड़े जीवन में साझा की गई चीजों व एक-दूसरे के दायरे में आने को लेकर हो रहे हैं, न कि स्त्री या पुरुष को लेकर। अपने-अपने इलाके की लड़ाई है, यह महिला या पुरुष का झगड़ा नहीं है।
कल्पवृक्ष, अमर उजाला से साभार