महारास श्रीकृष्ण की अद्भुत लीलाओं में से एक है। इसकी कल्पना गोपियों ने वृंदावन में मार्गशीर्ष के महीने में की थी। गोपियों ने वृंदावन में यमुना की रेत पर एक माह तक लगातार देवी कात्यायनी की पूजा की और रोज जाप किया। उनके प्रेम और तप के कारण प्रभु कृष्ण को आना ही पड़ा।
वहां प्रत्येक गोपी के साथ अलग-अलग रूप धारण कर कृष्ण ने महारास रचाया। इस महारास के गीत भागवत के दशम स्कंध में रास पंच अध्यायी के रूप से वर्णित किया हैं। महारास पूरे छह माह तक चला और यह रात्रि अहोरात्रि कहलाई।