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Lord Shiva: कैसे मिला भगवान शिव को तीसरा नेत्र ? जानिए शिवजी के नेत्र किन-किन बातों के हैं प्रतीक

Mon, 07 Aug 2023 12:22 PM IST
विनोद शुक्ला धर्म डेस्क, अमर उजाला

सार

शिवजी के तीनों नेत्र अलग-अलग गुणों के प्रतीक हैं जिसमें दांए नेत्र सत्वगुण और बांए नेत्र रजोगुण और तीसरे नेत्र में तमोगुण का वास है। भगवान शिव ही एक ऐसे देव हैं जिनकी तीसरी आंख उनके ललाट पर दिखाई देती है, जिसके कारण इन्हें त्रिनेत्रधारी भी कहा जाता है।
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भगवान शिव की तीसरी आंख का रहस्य
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विस्तार
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सावन माह शिवजी को अत्यंत प्रिय है। इस माह में की गई शिव उपासना सभी मनोरथों को पूर्ण करने वाली होती है। हम सभी जानते हैं कि भगवान शिव त्रिनेत्रधारी हैं, लेकिन क्या आप ये जानते हैं उन्हें ये तीसरी आंख मिली कैसे थी? 

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ऐसे प्रकट हुई तीसरी आंख
महाभारत के छठे खंड के अनुशासन पर्व के अनुसार नारदजी बताते हैं कि एक बार हिमालय पर्वत पर भगवान शिव सभा कर रहे थे। इस सभा में सभी देवता, ऋषि-मुनि और ज्ञानी लोग शामिल थे, तभी सभा में माता पार्वती आईं और उन्होंने शिवजी के साथ मनोरंजन करने के लिए उनकी दोनों आंखें अपने हाथों से बंद कर दीं। जैसे ही माता पार्वती ने शिवजी की आंखें ढकी पूरी सृष्टि में अंधेरा छा गया, लगने लगा कि सूर्य का कोई अस्तित्व ही न हो। धरती पर मौजूद सभी जीव-जंतुओं में खलबली मच गई। संसार की ये दशा भगवान शिव नहीं देख सकते थे और उन्होंने अपने माथे पर एक ज्योतिपुंज प्रकट किया जो भगवान शिव की तीसरी आंख बनी और तुरंत पूरी सृष्टि में प्रकाश हो गया। बाद में जब माता पार्वती ने इस तीसरी आंख के बारे में शिवजी से पूछा तो उन्होंने बताया कि अगर वो ऐसा नहीं करते तो पूरी सृष्टि का विनाश हो जाता, क्योंकि उनकी आंखें जगत की पालनहार हैं।

सत, तम और रजो गुण का प्रतीक
शिवजी के तीनों नेत्र अलग-अलग गुणों के प्रतीक हैं जिसमें दांए नेत्र सत्वगुण और बांए नेत्र रजोगुण और तीसरे नेत्र में तमोगुण का वास है। भगवान शिव ही एक ऐसे देव हैं जिनकी तीसरी आंख उनके ललाट पर दिखाई देती है, जिसके कारण इन्हें त्रिनेत्रधारी भी कहा जाता है। जिनमें एक आंख में चंद्रमा और दूसरी में सूर्य का वास है और तीसरी आंख को विवेक माना गया है। शिवजी के मस्तक पर दोनों भौंहों के मध्य विराजमान उनका तीसरा नेत्र उनकी एक विशिष्ट पहचान बनाता है।
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भूत, वर्तमान और भविष्य का वास
पुराणों के अनुसार भगवान शिव के तीनों नेत्रों को त्रिकाल का प्रतीक माना गया है। जिसमें भूत, वर्तमान और भविष्य का वास है। स्वर्गलोक, मृत्युलोक और पाताललोक भी इन्ही तीनों नेत्रों के प्रतीक हैं। भगवान शिव ही एक ऐसे देव हैं जिन्हें तीनों लोको का स्वामी कहा गया है।
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तीसरे नेत्र का संदेश
पुराणों में भगवान शिव की तीसरी आंख से जुड़ी एक कथा प्रचलित है,जिसमें प्रेम के देवता कामदेव अपनी क्रीड़ाओं के द्वारा शिव जी की तपस्या भंग करने का प्रयास करते हैं। और जैसे ही शिव जी की तपस्या भंग होती है शिव जी क्रोधित हो अपने तीसरे नेत्र की अग्नि से कामदेव को भस्म कर देते हैं। यह कथा मनुष्य जीवन के लिए प्रेरणा का स्त्रोत भी है। कामदेव का वास प्रत्येक मनुष्य के अंदर होता है, उसे अपने विवेक और बुद्धि द्वारा मन में उठने वाले क्रोध और अवांछित काम वासना को शांत करना चाहिए।


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