हिंदू धर्मग्रंथों में वर्णित सात वो महामानव जो आज भी अजर-अमर हैं और इस धरती पर मौजूद हैं, ऐसे महामानवों में से एक हनुमानजी भी हैं। सेतु डॉट ओआरजी नामक वेबसाइट में दावा किया गया है कि श्रीलंका में एक स्थान हैं जहां पर हर 41 साल में हनुमानजी यहां के एक विशेष समुदाय से मिलने आते हैं।
हनुमानजी जी कुछ दिन लोगों के साथ रहने के बाद फिर वापस चले जाते हैं। लेकिन हनुमानजी क्यों और कैसे आते हैं इस पर वेबसाइट ने व्यापक जानकारी प्रकाशित की है। जिसके कुछ प्रमुख अंश हम यहां दे रहे हैं।
श्रीलंका के मातंग आदिवासी
सेतु डॉट ओआरजी वेबसाइट के अनुसार श्रीलंका के जंगलों में मातंक नाम से एक ऐसा कबीलाई समूह रहता है जोकि पूर्णत: बाहरी समाज से कटा हुआ है। उनका रहन-सहन और पहनावा भी अलग है और उनकी भाषा भी प्रचलित भाषा से अलग है। मातंग समुदाय वही समुदाय है जिनसे मिलने हनुमानजी प्रत्येक 41 साल बाद उनसे मिलने आते हैं।
वेबसाइट को चलाने वाले सेतु नाम के आध्यात्मिक संगठन का दावा है कि इस बार 27 मई 2014 को हनुमानजी ने मातंग समूह के साथ आखिरी दिन बिताया था। इसके बाद अब हनुमानजी 2055 में फिर से इस समुदाय से मिलने आएंगे।
सेतु संगठन अनुसार, श्रीलंका में आदिवासी समूह को मातंग लोगों का समाज कहा जाता है। खास बात यह है कि हनुमान जी का जन्म भी मातंग ऋषि का आश्रम में ही हुआ था।
श्रीलंका के पिदुरु पर्वत के जंगलों में रहने वाले मातंग कबीले के लोग संख्या में बहुत कम हैं और बाकी समुदायों से अलग हैं। सेतु संगठन मातंग सुमुदाय को और करीब से जानने के लिए लिए जंगली जीवन शैली अपनाई और इनसे संपर्क साधना शुरू किया। संपर्क साधने के बाद उन समूह से उन्हें जो जानकारी मिली उससे जानकर वे हैरान रह गए।
'हनु पुस्तिका’ लिखते हैं मातंग बाबा
अध्ययनकर्ताओं अनुसार, हनुमानजी के साथ मातंगों के विचित्र संबंध हैं जिसके बारे में पिछले साल ही पता चला। मातंग संतों की गतिविधियों पर गौर किया गया, तो पता चला कि उनका यह सिलसिला रामायण काल से ही चला आ रहा है।
इन मातंगों की यह गतिविधियां प्रत्येक 41 साल बाद ही सक्रिय होती है। मातंगों अनुसार, हनुमानजी ने उनको वचन दिया था कि मैं प्रत्येक 41 वर्ष में तुमसे मिलने आऊंगा और आत्मज्ञान दूंगा। अपने वचन के अनुसार हनुमानजी हर 41 साल बाद आकर समुदाय के लोगों को आत्मज्ञान देते हैं।
सेतु अनुसार जब हनुमानजी उनके पास 41 साल बाद रहने आते हैं, तो इस दौरान उनके द्वारा किए गए हर काम और उनके बोले गए प्रत्येक शब्द को 'हनु पुस्तिका' नाम कॉपी में लिखा जाता है। आदिवासियों के मुखिया बाबा मातंग अपनी ‘हनु पुस्तिका’ में नोट करते हैं। 2014 के प्रवास के दौरान हनुमानजी द्वारा जंगल में मातंगों के साथ की गई सभी लीलाओं का विवरण भी इसी पुस्तिका में नोट किया गया है।
सेतु ने दावा किया है कि उनके संत पिदुरु पर्वत की तलहटी में स्थित अपने आश्रम में इस पुस्तिका तो समझकर इसका आधुनिक भाषाओं में अनुवाद करने में जुटे हुए हैं ताकि हनुमानजी के चिरंजीवी होने के रहस्य को जाना जा सके, लेकिन इन आदिवासियों की भाषा को समझने में काफी मुश्किल है इसलिए हनुमान जी की लीलाओं को समझने में काफी समय लग रहा है। आगे पढ़ें किस पर्वत में रहते हैं मातंग समुदाय के लोग।
कहां है यह पर्वत?
जिस पर्वत में मातंग समुदाय के लोग रहते हैं वह श्रीलंका के बीचोबीच स्थित है। यह पर्वत नुवारा एलिया शहर में है। इस पर्वतों की इस श्रृंखला के आसपास घंने जंगल है जहां आदिवासियों के कई समूह रहते हैं।
‘नुवारा एलिया’ पर्वत श्रृंखला
वाल्मीक-रामायण के अनुसार, श्रीलंका के मध्य में रावण का महल था। ‘नुवारा एलिया’ पहाड़ियों से लगभग 90 किलोमीटर दूर बांद्रवेला की तरफ मध्य लंका की ऊंची पहाड़ियों के बीचोबीच सुरंगों तथा गुफाओं के भंवरजाल मिलते हैं। यहां ऐसे कई पुरातात्विक अवशेष मिलते हैं जिनकी कार्बन डेटिंग से इनका काल निकाला गया है।
श्रीलंका में नुआरा एलिया पहाड़ियों के आसपास स्थित रावण फॉल, रावण गुफाएं, अशोक वाटिका और खंडहर हो चुके विभीषण के महल आदि की पुरातत्व विभाग ने जांच की जिसमें ये गुफाएं रामायण काल की होने की पुष्टि हुई है।
मातंगों ने की हनुमानज की सेवा
कहते हैं कि जब भगवान श्रीरामजी ने अपना मानव जीवन पूरा करके जल समाधि ले ली थी, तब हनुमानजी पुनः अयोध्या छोड़कर जंगलों में रहने चले गए थे। किष्किंधा आदि जगह होते हुए वे लंका के जंगलों में भ्रमण हेतु गए।
उस वक्त वहां विभीषण का राज था। विभीषण को भी चिरंजीवी होने का वरदान प्राप्त था। हनुमानजी ने कुछ दिन श्रीलंका के जंगलों में गुजारे जहां वे प्रभु श्रीराम का ध्यान किया करते थे। उस दौरान पिदुरु पर्वत में रहने वाले कुछ मातंग आदिवासियों ने उनकी खूब सेवा की।
उनकी सेवा से प्रसंन्न होकर हनुमानजी ने उनको वचन दिया कि प्रत्येक 41 साल बाद में तुमसे मिलने आऊंगा। यही कारण है कि हनुमानजी आज भी इस वचन का पालन करते हैं।
सेतु डॉट ओआरजी वेबसाइट को चलाने वाले इस आध्यात्मिक संगठन का केंद्र कोलंबों में है जबकि इसका साधना केंद्र पिदुरुथालागाला पर्वत की तलहटी में स्थित एक छोटे से गांव नुवारा में है। इस संगठन का उद्देश्य मानव जाति को फिर से हनुमानजी से जोड़ना है।