हिन्दू पंचांग के अनुसार
लोहड़ी पर्व मकर सक्रांति के एक दिन पहले मनाई जाती है। जबकि इस वर्ष लोहरी पर्व 12
जनवरी को मनाया जाएगा और मकर सक्रांति 14 जनवरी को। दोनों पर्वों में दो दिनों का
अंतर इसलिए आ गया है क्योंकि सूर्य 13 तारीख को अर्धरात्रि के बाद मकर राशि में
पहुंच रहा है। लोहरी को सूर्य के दक्षिणायन से उत्तरायण में आने का स्वागत पर्व भी
माना जाता है। पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, हिमाचल एवं कश्मीर में इस त्योहार की धूम
रहती है।
लोहड़ी के मौके पर होलिका दहन की तरह लकड़ियों एवं उपलों ढ़ेर
बनाया जाता है। शाम के समय लकड़ियों को जलाकर सभी लोग आग के चारों ओर नाचते गाते
हैं। प्रज्वलित अग्नि में लोग रवि फसलों को अर्पित करते हैं, क्योंकि इस समय रवि
फसलें कटकर घर आने लगती हैं। हिन्दू शास्त्रों की मान्यता है कि, अग्नि में समर्पित
की गयी सामग्री यज्ञ भाग बनकर देवताओ तक पहुंच जाती है।
पवित्र अग्नि में
लोग रेवड़ी, तिल, मूँगफली, गुड़ व गजक भी अर्पित करते हैं। इस तरह से लोग सूर्य देव
और अग्नि के प्रति आभार प्रकट करते हैं क्योंकि उनकी कृपा से कृषि उन्नत होती है।
सूर्य और अग्नि देव से प्रार्थना की जाती है कि आने वाले साल में भी कृषि उन्नत हो
और घर अन्न धन से भरा रहे।
जिन स्त्रियों की शादी के बाद पहली लोहड़ी होती
है तथा जिनके घर संतान का जन्म होता है उनके लिए इसका खास महत्व होता है। कन्या के
मायके से लड़की की मां कपड़े, मिठाईयां, गजक, रेवड़ी अपनी बेटी के लिए भेजती है।
माना जाता है कि दक्ष प्रजापति के तिरस्कार के कारण सती को आत्मदाह करना पड़ा था।
इसी घटना के प्रायश्चित स्वरूप माताएं अपनी बेटियों को उपहार भेजती हैं और उनके
सुखी वैवाहिक जीवन की कामना करती हैं। छोटे बच्चों को मां अपनी गोद में लेकर लोहड़ी
की आग तपाती हैं। माना जाता है कि इससे बच्चे का स्वास्थ्य अच्छा रहता है।
ऐसे पड़ा लोहड़ी नाम
लोहड़ी पर्व के नाम के विषय में भगवान श्री कृष्ण
से जुड़ी कथा प्रचलित है। कथा के अनुसार मकर संक्रांति की तैयारी में सभी गोकुलवासी
लगे थे। इसी समय कंस ने लोहिता नामक राक्षसी को भगवान श्री कृष्ण को मारने के लिए
भेजा। लेकिन भगवान श्री कृष्ण ने लोहिता के प्राण हर लिये। इस उपलक्ष में मकर
संक्रांति से एक दिन पहले लोहरी पर्व मनाया जाता है। लोहिता के प्राण हरण की घटना
को याद रखने के लिए इस पर्व का नाम लोहड़ी रखा गया।