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कोजागरी पूर्णिमा का महत्व: अमृतमयी चांदनी, आरोग्य और धन-ऐश्वर्य प्राप्ति का पावन पर्व

Fri, 23 Oct 2026 07:30 PM IST
विनोद शुक्ला धर्म डेस्क, अमर उजाला

सार

आश्विन मास की शरद पूर्णिमा की रात को चंद्रमा सभी तरह के सोलह कलाओं से परिपूर्ण होकर पृथ्वी पर शीतलता,आरोग्य और शांति रूपी अमृत की वर्षा करते हैं। कोजागरी पूर्णिमा की रात में चांद पृथ्वी के सबसे करीब और इस रात्रि में चंद्रमा का ओज सबसे तेजवान और ऊर्जावान होता है।
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शरद पूर्णिमा - फोटो : amar ujala
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विस्तार
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आश्विन मास की शरद पूर्णिमा का हिंदू धर्म में विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व है। इसे कोजागरी पूर्णिमा भी कहा जाता है। इस पावन रात्रि को चंद्रमा की शीतल चाँदनी, माँ लक्ष्मी की पूजा-अर्चना, खीर का प्रसाद और भगवान श्रीकृष्ण की दिव्य महारास लीला का विशेष महत्त्व माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह रात्रि सुख-समृद्धि, आरोग्य, शांति और प्रेम का संदेश लेकर आती है।
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1. शरद पूर्णिमा की चांदनी का अमृतमयी प्रभाव
आश्विन मास की शरद पूर्णिमा की रात्रि में चंद्रदेव अपनी सोलह कलाओं से परिपूर्ण होकर पृथ्वी पर शीतलता,आरोग्य,पोषक शक्ति एवं शांति रुपी अमृत की वर्षा करते हैं। कोजागरी पूर्णिमा की रात में चाँद पृथ्वी के सबसे करीब एवं इस रात्रि में चंद्रमा का ओज सबसे तेजवान और ऊर्जावान होता है। पूर्ण कांतिमय चन्द्रमा की शीतल किरणें जब फसलों, पेड़-पौधों, पेय और खाद्य पदार्थों पर पड़ती हैं तो इनमें अमृत्व का प्रभाव आ जाता है और तब ये जीवनदायनी होकर जीव-जगत को आरोग्य प्रदान करती हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है-पुष्णामि चौषधिः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्यमकः। ''मैं रसस्वरूप अर्थात अमृतमय चन्द्रमा होकर सम्पूर्ण औषधियों और वनस्पतियों को पुष्ट करता हूँ''।

 2. शरद पूर्णिमा पर मां लक्ष्मी की पूजा-अर्चना एवं व्रत का महत्त्व
नारद पुराण के अनुसार शरद पूर्णिमा पर लक्ष्मी जी चन्द्रमण्डल से उतरकर अपने कर-कमलों में वर और अभय लिए निशीथ काल में संसार में विचरण करती हैं। इस दिन माँ यह भी देखती हैं कि भूतल पर कौन जाग रहा है,यानि अपने कर्तव्यों को लेकर कौन जाग्रत है। जो इस रात में जागकर लक्ष्मीजी के साथ भगवान रजनीश यानि चंद्रमा की पूजा-अर्चना करते है माँ लक्ष्मी की उन पर असीम कृपा होती है, प्रतिवर्ष किया जाने वाला यह व्रत लक्ष्मीजी को संतुष्ट करने वाला है। 
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ज्योतिषीय मतानुसार जो इस रात लक्ष्मी जी की षोडशोपचार विधि से पूजा करके श्री सूक्त का पाठ, कनकधारा स्त्रोत, विष्णुसहस्त्रनाम का पाठ करते है मां उनको धन-धान्य व ऐश्वर्य प्रदान करती हैं। शास्त्रों के अनुसार माता लक्ष्मी का जन्म शरद पूर्णिमा के दिन हुआ था इसीलिए देश के कई हिस्सों में शरद पूर्णिमा को लक्ष्मीजी का पूजन किया जाता है। कुंआरी कन्याएं इस दिन सुबह सूर्य और चन्द्र देव की पूजा अर्चना करें तो उन्हें मनचाहे वर की प्राप्ति होती है।

 3. भगवान श्रीकृष्ण और राधा की दिव्य महारास लीला
भगवान श्री कृष्ण और राधा की अदभुत और दिव्य रासलीलाओं का आरम्भ भी शरद पूर्णिमा के दिन हुआ। पूर्णिमा की श्वेत उज्जवल चाँदनी में भगवान श्री कृष्ण ने अपनी नौ लाख गोपिकाओं के साथ स्वंय के ही नौ लाख अलग-अलग गोपों के रूप में आकर ब्रज में महारास रचाया था। इस दिन भगवान ने गोपियों की कई जन्मों की तपस्या को पूर्ण किया और गोपियाँ मुरलीधर की लीला का अंश बनकर धन्य हुई।

4. शरद पूर्णिमा की चांदनी में खीर रखने का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व
माना जाता है कि कोजागरी की शीतल चांदनी तन पर लेने वालों को शांति,शक्ति और उत्तम स्वास्थ्य लाभ प्राप्त होता है।शरद पूर्णिमा की शीतल चाँदनी में खीर रखने का विधान है,खीर में मिश्रित दूध, चीनी और चावल के कारक भी चन्द्रमा ही है, अतः इनमें चन्द्रमा का प्रभाव सर्वाधिक रहता है। 3-4 घंटे तक खीर पर जब चन्द्रमा की किरणें पड़ती है तो यही खीर अमृत तुल्य हो जाती है, जिसको प्रसाद रूप में ग्रहण करने से व्यक्ति वर्ष भर निरोग रहता है उसका शरीर पुष्ट और कांतिवान हो जाता है।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। 

 

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