उद्घाटन में 'उद्' अर्थात प्रकट करना अर्थात देवता तरंगों को प्रकट करना। अथवा कार्यस्थल पर उन्हें स्थान ग्रहण करने हेतु प्रार्थना कर कार्यारम्भ करना अर्थात उद्घाटन करना। हिन्दू धर्म में प्रत्येक कृति अध्यात्मशास्त्र पर आधारित है। किसी भी कार्य अथवा समारोह को पूर्ण करने के लिए देवता के आशीर्वाद आवश्यक हैं। शास्त्रीय पद्धति के अनुसार उद्घाटन करने से दैवीय तरंगों का कार्यस्थल पर आगमन सहज होता है। इससे वहां की कष्टदायक स्पंदनों के संचार पर अंकुश लगता है। इसलिए उद्घाटन विधिवत अर्थात अध्यात्मशास्त्र पर आधारित विधियों के अनुसार ही करना चाहिए।
उद्घाटन की पद्धतियां
व्यासपीठ के कार्यक्रमों का उद्घाटन- परिसंवाद, साहित्य सम्मेलन, संगीत महोत्सव इत्यादि का उद्घाटन दीप प्रज्ज्वलन से किया जाता है। व्यासपीठ की स्थापना से पूर्व नारियल फोड़ें और उद्घाटन के समय दीप प्रज्ज्वलित करें। नारियल फोड़ने का मुजही उद्देश्य है कार्यस्थल की शुद्धि। व्यासपीठ ज्ञान दान के कार्य से संबंधित है अर्थात वह ज्ञानपीठ हैम इसलिए वहां दीपक का महत्व है।
दुकान, प्रतिष्ठान इत्यादि का उद्घाटन- दुकान, प्रतिष्ठान इत्यादि अधिकांशत: व्यावहारिक कर्म से संबंधित होते हैं। उनके उद्घाटन के अंतर्गत दीप प्रज्ज्वलन की आवश्यकता नहीं होती। इसलिए यहां केवल नारियल फोड़ें। ।
संतों के कर-कमलों द्वारा उद्घाटन व दीप प्रज्वलन करवाने का महत्व- संतों के अस्तित्व मात्र से देवता की तरंगें कार्य स्थल की ओर आकृष्ट व कार्यरत होती हैं ।इससे वातावरण चैतन्यमय व शुद्ध बनता है और कार्यस्थल की शुद्धि में सहायता मिलती है। इसलिए संतों के करकमलों द्वारा उद्घाटन के अंतर्गत नारियल फोड़ने की आवश्यकता नहीं होती। (उद्घाटन के लिए संतों को आमंत्रित करने का महत्व ज्ञात होता है। दुर्भाग्य की बात यह है कि आजकल कार्यकर्ताओं, चित्रपट अभिनेताओं, क्रिकेट खिलाड़ियों को उद्घाटन के लिए आमंत्रित किया जाता है।)
फीता काटकर उद्घाटन क्यों न करें
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पश्चिमी संस्कृति के अनुसार फीता काटकर उद्घाटन क्यों न करें ?
किसी वस्तु को काटना विध्वंसक वृत्ति का दर्शक है। फीता काटने की तामसी कृति द्वारा उद्घाटन करने से वास्तु की कष्टदायक स्पंदनों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। जिस कृति से कष्टदायक तरंगों की निर्मिती होती है, वह हिंदू धर्म में त्याज्य (त्यागने योग्य) है; इसलिए फीता काटकर उद्घाटन न करें ।
नारियल फोड़ना
व्यासपीठ की स्थापना से पूर्व भूमि पूजन के समय नारियल फोड़ा जाता है। जिस भूभाग पर व्यासपीठ की स्थापना करनी होती है, उसके शुद्धिकरण से वहां की कष्टदायी स्पंदनों का निराकरण किया जाता है। जहां व्यासपीठ पहले ही स्थापित हो, वहां उसके सामने धरती पर एक पत्थर रखकर, स्थान देवता से प्रार्थना कर नारियल फोड़ें। व्यासपीठ पर किसी भी समारोह की तैयारी आरंभ करने से पूर्व स्थान की शुद्धि आवश्यक है, अन्यथा कार्यक्रम का आरंभ निर्धारित समय पर न हो पाना, कार्यक्रम-स्थल पर अस्वस्थता, तैयारी करने में थकान इत्यादि कष्टों की आशंका रहती है । प्रार्थना द्वारा स्थान देवता के आवाहन से उनकी कृपा स्वरूप नारियल-जल के माध्यम से स्थान देवता की तरंगें सर्व दिशाओं में फैलती हैं। इससे कार्यस्थल में प्रवेश करने वाली कष्टदायी स्पंदनों की गति पर अंकुश लगाना संभव होता है । उस परिसर में स्थान-देवताकी सूक्ष्म-तरंगों का मंडल तैयार होता है और समारोह निर्विघ्न संपन्न होता है ।
नारियल फोड़ने के उपरांत दीपप्रज्जवलन
नारियल फोड़ना अर्थात् नाकारात्मक शक्तियों के संचार पर अंकुश लगाना व दीप प्रज्वलन अर्थात् ज्ञान पीठ पर कार्यरत दैवी तरंगों का स्वागत कर,उन्हें प्रसन्न करना। इसलिए प्रथम नारियल फोडकर स्थान देवता का आवाहन कर वहां की नाकारात्मक शक्तियों को नियंत्रित करने हेतु उनसे प्रार्थना की जाती है; तदुपरांत दीप प्रज्वलित कर दीप द्वारा प्रक्षेपित तरंगों के कारण अधिक प्रभावी नकारात्मक शक्तियों के संचार पर अंकुश लगाकर व्यास पीठ से ज्ञानदान का कार्य किया जाता है ।
दीप प्रज्जवलन का महत्व
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दीप प्रज्जवलन का महत्व
दीप प्रज्जवलन से ईश्वरीय संकल्प शक्ति कार्यरत होती है तथा मनोवांछित कार्य सिद्ध होते हैं इसके अतिरिक्त कार्यस्थल के चारों ओर दैवीय सुरक्षा कवच की निर्मिति भी होती है।
दीपप्रज्ज्वलन के लिए प्रयुक्त दीपस्तंभ में घी की अपेक्षा तेल डालना अधिक योग्य क्यों है ?
दीप प्रज्वलन के लिए प्रयुक्त दीपस्तंभ में तेल का प्रयोग करें। तेल रजोगुणी तरंगों के तथा घी सात्त्विक तरंगों के प्रक्षेपण का प्रतीक है। किसी भी कार्य को गति प्रदान करने हेतु रजोगुणी क्रिया तरंगें आवश्यक होती हैं। तेल की ज्योति ब्रह्मांड में विद्यमान देवताओं की क्रिया तरंगों को जागृत कर उन्हें कार्यरत रखती है; इसलिए दीप-प्रज्ज्वलन हेतु प्रयुक्त दीपस्तंभ में तेल का प्रयोग श्रेयस्कर है।
दीपप्रज्ज्वलन मोमबत्ती से नहीं
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दीपप्रज्ज्वलन मोमबत्ती से नहीं, अपितु तेल के दीप (संकर्ण दीप) से क्यों करें ?
मोमबत्ती द्वारा प्रक्षेपित तरंगें तम-रजयुक्त होती हैं। इन तरंगों के कारण वातावरण तामसी बनता है और सात्विकता नष्ट हो जाती है। मोमबत्ती द्वारा दीप प्रज्वलित करने पर दीपस्तंभ के चारों ओर तम कणों का मण्डल तैयार होता है। इस कारण दीपस्तंभ की ज्योति की ओर आकृष्ट ब्रह्मांड में विद्यमान देवता की क्रिया तरंगें बाधित होती हैं। इसके विपरीत तेल रजोगुण का प्रतीक है और तेल की ज्योति ब्रह्मांड में विद्यमान देवताओं की क्रिया तरंगों को जागृत कर कार्यरत करने में सहायक होती है। इसलिए दीप प्रज्वलन हेतु प्रयुक्त तेल के दीप (संकर्ण दीप) का प्रयोग श्रेयस्कर है।
(संदर्भ : सनातन-निर्मित ग्रंथ ‘पारिवारिक धार्मिक व सामाजिक कृतियों का आधारभूत शास्त्र’)