12 नबंवर को सिखों के प्रथम गुरु नानक देव जी का 550वां प्रकाश पर्व मनाया जाएगा। करतारपुर गुरूद्वारा गुरु नानक देव जी ने ही बसाया था और यहीं पर गुरुनानक जी ने अपने जीवन के 17 साल बिताने के पश्चात प्राण त्याग दिए थे। इस वजह से सिखों के लिए करतारपुर गुरुद्वारा काफी महत्त्वपूर्ण है। आइए जानते है कि करतारपुर गुरूद्वारा कैसे सिखों के प्रथम गुरु नानक देव जी के जीवन से जुड़ा है।
पाकिस्तान के नारोवाल जिले में स्थित करतारपुर गुरुद्वारा गुरु नानक देव जी की समाधि पर बना हुआ है। कहा जाता है कि यहां गुरुनानक जी अपने जीवन के शुरुआती समय में खेती किया करते थे। गुरुनानक जी ने यही से 'नाम जपो, किरत करो और वंड छको' अर्थात् (नाम जपें, मेहनत करें और बांट कर खाएं) का सबक दिया था।
बाद में नानक जी ने यहां से ही
पवित्र लंगर की शुरुआत की थी तब से कोई भी व्यक्ति करतारपुर से भूखे पेट वापस नहीं जाता और यहां की खास बात यह है कि यहां अपनी-अपनी श्रृद्धा के हिसाब से लंगर के लिए मुस्लिम भी चंदा देते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सन् 1985 में यहां जो बम गिरा था वह भी चमत्कारी शक्तियों के चलते फूटा नहीं था और उस बम को सेवाधारियों ने वहीं मढ़कर रख दिया था।
करतारपुर गुरुद्वारे में सिखों ने गुरु नानक देव जी के पार्थिव शरीर के स्थान पर मिले फूलों की अंत्योष्टि हिंदू रीति-रिवाजों से की थी वहीं मुसलमानों ने फूलों को दफना दिया था तब से करतारपुर गुरुद्वारे
में गुरु नानक देव जी की समाधि और क्रब दोनों हैं।