अगर आप किसी भी चीज को गहराई में देखें, चाहे आपकी उंगलियों के निशान हों, आंख की पुतली हो या बाल, हर चीज विशिष्ट है। पूरे ब्रह्मांड में ढूंढें, तो आपको कोई भी दो चीज ऐसी नहीं मिलेगी, जो एक जैसी हो। लेकिन लोग परिचित चीजों में ही फंसकर रह जाते हैं। वे जाने-पहचाने रास्ते पर ही चलना चाहते हैं।
आगे बढ़ने का एक अहम कदम यह हो सकता है कि मन को ऐसे विकसित करें कि वह केवल परिचित चीजों को न खोजे। यह संसार से संन्यास तक की यात्रा है। संन्यास का मतलब साधु हो जाना नहीं है, इसका मतलब है 'चक्र को तोड़ना'। संसार का मतलब परिवार नहीं है, इसका मतलब है बार-बार एक ही चक्र को दोहराते रहना। जब परिचित की तलाश करते हैं, तो हम हमेशा समानता ढूंढते रहते हैं।
दुर्भाग्य से भौतिक विज्ञान में भी लोग, दो चीजों के बीच संबंध स्थापित करने के लिए ऐसे संयोगों को ही ढूंढ रहे हैं। यह चीजों को देखने का एक तरीका है, लेकिन यह बाहरी सतह तक ही सीमित है। अपरिचित क्षेत्र में कदम बढ़ाने के लिए आपका शरीर, आपकी भावनाएं पूरी तरह से संतुलित और स्थिर होनी चाहिए।