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सनातन धर्म वस्तु और व्यक्ति में परमात्मा का दर्शन करने की शिक्षा देता है

Sun, 26 Aug 2018 10:23 AM IST
श्रीमाता अमृतानंदमयी देवी
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मुझे अपने बचपन की कुछ घटनाएं स्मरण हो आई हैं। मैं समुद्र-तट पर रहने वाले एक निर्धन परिवार में जन्मी। मैं घर का सारा काम-काज करती थी। आंगन में झाड़ू लगाते समय, यदि गलती से हमारा पांव अखबार के एक टुकड़े पर पड़ जाता तो हम झुककर उसे छूकर फिर माथे से लगाते। और यदि ऐसा नहीं करते तो मां हमारी पिटाई करती। वह हमसे कहती, "यह कागज सरस्वती माता हैं।" हमारे यहां एक गाय हुआ करती थी। यदि मैं गोबर पर पांव रख देतीं, तो भी नमन करती कि इस गोबर से घास उगाने के लिए खाद बनती है। जब मैं घर में प्रवेश करतीं, तो दरवाजे की चौखट पर सीधे पांव नहीं रखती। गलती से रख भी देती, तो नमस्कार करना पड़ता था।

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मेरी मां यह सब सिखाती थीं। ऐसे आचार-व्यवहार से हम परमात्मा की सर्व-व्यापकता को जानना-पहचानना शुरू करते हैं। सनातन धर्म हमें प्रत्येक वस्तु, व्यक्ति में परमात्मा का दर्शन करने की शिक्षा देता है। सनातन धर्म हमें यही सिखाता है। सच्चे हृदय से पश्चाताप करें, तो प्रत्येक पापी के लिए मुक्ति की संभावना है। गलतियां करें, तब भी सच्चे मन से कोशिश करें कि फिर उन्हें न दोहराएं। लुटेरे रत्नाकर की जीवन-कथा हम सबके लिए एक अच्छा सबक है। अपने परिवार के पालन के लिए, वह जंगल में से गुजरने वाले प्रत्येक व्यक्ति को लूटता था। यद्यपि वे ऋषि, जिन्हें वह लूटने चला था, यह जानते थे फिर भी उन्होंने उसे नकारा नहीं। यदि वे उसकी भर्त्सना करते, तो कदाचित उसका रूपांतरण कभी न होता, वह महर्षि वाल्मीकि कभी न होता! 

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