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कान छिदवाने की परंपरा के पीछे कई फायदे, जानें धार्मिक और वैज्ञानिक कारण

Wed, 25 Sep 2019 08:20 AM IST
विनोद शुक्ला धर्म डेस्क, अमर उजाला
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कान पर तिल
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कान छिदवाना हिंदू संस्कारों का हिस्सा रहा है, यह हमारी रीति- रिवाज और परंपरा का अभिन्न हिस्सा है। कर्ण भेदन की इस क्रिया का हमारी सभ्यता में बहुत महत्व है। बहुत से क्षेत्र की परंपराओं में तो पुरुषों को भी कान छिदवाना अनिवार्य है। हालांकि अब ये फैशन में शामिल हो गया है। भारत में कान छिदवाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है।

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आज के समय में भारत में ही नहीं फैशन के कारण विदेशों में भी कान छिदवाने की परंपरा चलन में है। आजकल पुरुष भी बड़ी मात्रा में ये काम कर रहे है। कान छिदवाने की धार्मिक मान्यताएं तो बहुत अधिक हैं। वहीं इसके पीछे स्वास्थ्य के लाभ भी छुपे हुए हैं।

वैज्ञानिक मान्यता

वैज्ञानिक तथ्यों के अनुसार जिस जगह कान छिदवाया जाता है वहां पर दो बहुत जरूरी एक्यूप्रेशर प्वाइंट्स मौजूद होते हैं। पहला मास्टर सेंसोरियल और दूसरा मास्टर सेरेब्रल जो कि सुनने की क्षमता को बढ़ाते हैं। इस बारे में एक्यूपंक्चर में कहा गया है कि जब कान छिदवाए जाते हैं तो इसका दबाव ओसीडी पर पड़ता है, जिसके कारण घबराहट कम होती है और कई तरह की मानसिक बीमारियां भी दूर हो जाती हैं। 
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कान छिदवाने से दिमाग के कई हिस्से सक्रिय हो जाते हैं इसलिए जब बच्चे के दिमाग का विकास हो रहा हो तभी बच्चे का कान छिदवा देना चाहिए।

कान छिदवाने से हमारी आंखों की रौशनी सही रहती है, इसके अलावा यह हमारी ब्रेन पावर को बढ़ाने का काम भी करता है। दरअसल, कान के निचले हिस्से में एक प्वाइंट होता है, जब वो दबता है तो उससे आंखों की रौशनी तेज होती है। 

कानों के निचले हिस्से का संबंध भूख लगने से भी होता है। कान छिदवाने से पाचन क्रिया दुरुस्त बनी रहती है और मोटापा कम होता है। मान्यता है कि कान छिदवाने से लकवा की बीमारी नहीं होती है। वहीं कान छिदवाने से साफ सुनने में भी मदद मिलती है।

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