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जिस व्रत से प्रसन्न होकर शिव ने पार्वती को बनाया जीवनसंगिनी

Sun, 08 Sep 2013 07:51 AM IST
टीम डिजिटल
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हर व्यक्ति की चाहत होती है कि उसे सुयोग्य, सुंदर और स्वस्थ जीवनसाथी मिले। इसके लिए शास्त्रों में कई व्रतों का उल्लेख मिलता है। इन्हीं में से एक व्रत है हरितालिका तीज का व्रत। यह व्रत प्रत्येक वर्ष भद्रपद माह में शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को आता है।
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इस वर्ष यह तिथि 8 सितम्बर को है। ऐसी मान्यता है कि इस व्रत की शुरूआत माता पार्वती ने की थी। हरितालिका व्रत से प्रसन्न होकर ही भगवान शिव ने पार्वती को पत्नी रूप में स्वीकार करने का वरदान दिया था।

इस व्रत के विषय में मान्यता है कि पार्वती के माता-पिता पार्वती की शादी भगवान विष्णु से करना चाहते थे। जबकि पार्वती भगवान शिव को पति रूप में पाना चाहती थी। पार्वती ने अपने मन की बात अपनी प्रिय सखियों को बताई।
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सखियों ने पार्वती को महल से निकालकर वन में पहुंचा दिया। पार्वती के महल में नहीं होने पर इनके माता-पिता को लगा कि किसी ने पार्वती का हरण कर लिया है।

दूसरी ओर पार्वती वन में पहुंचकर एक कंदरा में छुप गयी। भद्रपद शुक्ल पक्ष के दिन पार्वती निर्जल और निराहार रहकर भगवान शिव की आराधना करने लगी। भगवान शिव पार्वती की श्रद्धा-भक्ति देखकर प्रसन्न हो गये और पत्नी रूप में स्वीकार करने का वरदान दिया।

पार्वती का यह व्रत सखियों द्वारा हरण किये जाने के कारण पूरा हुआ था इसलिए इस व्रत का नाम हरितालिका पड़ा। इस व्रत का नाम हरितालिका होने का एक दूसरा कारण यह भी माना जाता है कि इसमें अन्न-जल का पूरी तरह त्याग किया जाता है। यानी व्रती भूख हड़ताल पर रहते हैं।

शास्त्रों में इस व्रत का अधिकार सभी स्त्रियों को दिया गया है। शास्त्रों के अनुसार विवाह योग्य स्त्रियां इस व्रत से सुयोग्य जीवनसाथी प्राप्त कर सकती हैं। विवाहित स्त्रियों को इस व्रत से अखंड सौभाग्यवती होने का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

इस व्रत से पति की आयु लंबी होती है साथ ही दांपत्य जीवन में आपसी प्रेम बढ़ता है। सुख-समृद्धि में भी इजाफा होता है। भविष्य पुराण में कहा गया है कि हरितालिका तीज के दिन गुड़ का मालपुआ बांटने वाले पर शिव पर पार्वती की अनुपम कृपा होती है।
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