Guru aur Anya mein antar
- फोटो : istock
भगत एवं गुरु : भगत सांसारिक अड़चनें दूर करते हैं ,तो गुरु का सांसारिक अड़चनों से संबंध नहीं होता .उनका संबंध केवल शिष्य की आध्यात्मिक उन्नति से होता है ।
संत एवं गुरु : संत सकाम और निष्काम की प्राप्ति के लिए थोड़ा बहुत मार्गदर्शन करते हैं । कुछ संत लोगों की व्यावहारिक कठिनाइयां दूर करने के लिए बुरी शक्तियों के कष्टों से होने वाले दुख को दूर करते हैं । ऐसे संतों का कार्य यही होता है । जब कोई संत साधक को शिष्य के रूप में स्वीकार करते हैं, तो वे उसके लिए गुरु बन जाते है। गुरु केवल निष्काम प्राप्ति के लिए पूर्ण रूप से मार्गदर्शन करते हैं । जब कोई संत गुरु होकर कार्य करते हैं तो उनके पास आने वालों की 'सकाम अडचनो को दूर करने के लिए मार्गदर्शन मिले यह इच्छा धीरे-धीरे कम हो जाती है और अंत में समाप्त हो जाती है, परंतु जब वह किसी को शिष्य स्वीकार करते हैं तब उसका सभी प्रकार से बहुत ध्यान रखते हैं ।प्रत्येक गुरु संत होते हैं परंतु प्रत्येक संत गुरु नहीं होते, फिर भी, संत के अधिकांश लक्षण गुरु को लागू होते हैं।
गुरु कृपा होने के लिए गुरु पर पूर्ण श्रद्धा होना आवश्यक है। यदि किसी में लगन व श्रद्धा हो, तो उसे गुरु की कृपा अपने आप मिलती है । गुरु को उसके लिए कुछ करना नहीं पडता । केवल संपूर्ण श्रद्धा होना आवश्यक है । गुरु ही उसे उसके लिए पात्र बनाते हैं ।
संदर्भ : सनातन संस्था का ग्रंथ 'गुरुकृपायोग'
कु. कृतिका खत्री,
सनातन संस्था, दिल्ली