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Guru Gobind Singh Jayanti 2021: सवा लाख से एक लड़ाऊँ, चिड़ियों सों मैं बाज तड़ऊँ, तबे गोबिंद सिंह नाम कहाऊँ

Wed, 20 Jan 2021 12:05 AM IST
Shashi Shashi धर्म डेस्क, अमर उजाला
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गुरु गोबिंद सिंह जी के द्वारा सन् 1699 में 13 अप्रैल बैसाखी के दिन खालसा पंथ की स्थापना की गई। यह सिखों के इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटना मानी जाती है।
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गुरु गोविंद सिंह जी सिखों के दसवें गुरु थे। गुरू गोविंद सिंह जी के बचपन का नाम गोविंद राय था, जो इनके पिता गुरु तेगबहादुर जी के द्वारा रखा गया था। सन् 1699 में बैसाखी के दिन गुरुजी प्यारों के द्वारा अमृत चखने के बाद ये गुरु गोविंद सिंह कहलाए। इनकी माता का नाम गुजरी जी था। ये एक महान स्वतंत्रता सेनानी और कवि भी थे। इस बार गुरु गोविंद सिंह जी की जयंती 20 जनवरी 2021 को है। इस दिन को लोग प्रकाश पर्व के रूप में मनाते हैं। आज भी इनके त्याग और वीरता की मिसाल दी जाती है। ''सवा लाख से एक लड़ांऊ'' ये शब्द गुरू गोविंद जी की वीरता और साहस के संदर्भ में ही कहे जाते हैं। उनके अनुसार वीरता और साहस में एक सिख सवा लाख लोगों के बराबर है। इस दिन गुरुद्वारों की साज-सजावट की जाती है, कीर्तन दरबार लगता है। 

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ऐसे हुई खालसा पंथ की स्थापना
गुरु गोविंद सिंह जी के द्वारा सन् 1699 में 13 अप्रैल बैसाखी के दिन खालसा पंथ की स्थापना की गई। यह सिखों के इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटना मानी जाती है। खालसा का मतलब होता है खालिस यानि शुद्ध जो मन, वचन एवं कर्म से पूरी तरह से शुद्ध हो और समाज के प्रति पूरी तरह से समर्पण का भाव रखता हो। 
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पंज प्यारे की स्थापना कैसे हुई?
पंज प्यारे की स्थापना से पहले सिख समुदाय की एक सभा में उन्होंने सबके सामने पूछा, कौन अपने सिर का बलिदान देना चाहता है? उसी समय एक स्वयं सेवक तुरंत सामने आकर इस बात के लिए तैयार हो गया जिसके बाद गुरु गोविंद सिंह जी उसे अपने साथ दूसरे तंबू में ले गए जब कुछ देर बाद वे वापस लौटे तो उनकी तलवार पर खून लगा हुआ था। उसके बाद गोविंद जी ने दोबारा भीड़ में खड़े लोगों से वही सवाल पूछा तो फिर से उसी प्रकार एक और व्यक्ति राजी हो गया और उनके साथ चला गया। जिसके बाद वे फिर वह खून से सनी तलवार लेकर बाहर आए। इसी तरह से एक-एक करके जब पांचवा स्वयंसेवक भी उनके साथ तंबू के भीतर चला गया, तब इसके कुछ समय बाद गुरु गोविंद सिंह सभी जीवित सेवकों के साथ वापस बाहर आ गए और उन्होंने उन्हें पंज प्यारे या पहले खालसा का नाम दिया। इस तरह से पंज प्यारे की स्थापना हुई।
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