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गीता में लिखी इन 3 बातों को खुद पर करें लागू, हमेशा रहेंगे खुश

Mon, 27 Nov 2017 09:12 AM IST
पूनम नेगी
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ऋषि-मुनियों ने गीता का महत्व गंगा से भी अधिक माना है। गंगा तो भगवान के श्रीचरणों से निकली और गीता भगवान के हृदय क्षेत्र से। गीता के अठहत्तर भाषाओं में 250 से ज्यादा अनुवाद, दर्जनों टीकाएं एवं भाष्य हो चुके हैं। (राष्ट्रपिता महात्मा गांधी 'गीता' के जबरदस्त प्रशंसक थे। वह गीता को अपनी 'माता' कहते थे। उनकी गीता पर टीका 'अनासक्ति योग' भी एक पठनीय ग्रन्थ है, जिसमें उपनिषदों का सार निहित है। उन्होंने स्वयं अपने जीवन में  अनासक्ति योग का पालन किया)।
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गीता साधारण कर्म को योग में बदलने के लिए तीन साधनों पर बल देती है, एक- फल की आकांक्षा का त्याग। दूसरे, कर्त्ता के अहंकार से मुक्ति और तीसरे, किए गए कर्मों को परमात्मा के प्रति समर्पित करना। इन सूत्रों में वेदों एवं  उपनिषदों का सार भी झलकता है। ज्ञान, भक्ति एवं कर्म की इस अनूठी त्रिवेणी को जितनी बार पढ़ते जाता है, उसके आगे ज्ञान के नित नए रहस्य खुलते जाते हैं। युद्ध से पूर्व विषादग्रस्त अर्जुन को निष्काम कर्म के पथ पर प्रेरित करने के लिए श्रीकृष्ण और अर्जुन के बीच का संवाद इस गीताज्ञान का मूलतत्व है।

अठारह अध्यायों के सात सौ श्लोकों में समाई इस अद्भुत ज्ञान गंगा का कोई सानी नहीं है। यूं तो भगवद्गीता सबसे बड़े महाकाव्य महाभारत के छठे खंड 'भीष्म पर्व' का वह हिस्सा है। मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी को कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि में कृष्ण ने अर्जुन को इस ज्ञान का संप्रेषण किया, इसलिए इस दिन को मोक्षदा एकादशी तथा गीता जयंती के रूप में भी जाना जाता है। ऋषि-मुनियों ने गीता का महत्व गंगा से भी अधिक माना है। गंगा तो भगवान के श्रीचरणों से निकली और गीता भगवान के हृदय क्षेत्र से।

गीताज्ञान की लोकप्रियता का अंदाज इसी से लगाया जा सकता है कि अपने विषय और  वैशिष्ट्य के कारण अठहत्तर भाषाओं में 250 से ज्यादा अनुवाद और दर्जनों टीकाएं एवं भाष्य हो चुके हैं। इनमें प्रमुख टीका व बहुचर्चित भाष्य हैं, अष्टावक्र गीता (राजा जनक व अष्टावक्र के मध्य का संवाद), अवधूत गीता  (दत्तात्रेय महाराज), गीता भाष्य (आदि शंकराचार्य), गीता भाष्य (रामानुज), ज्ञानेश्वरी (संत ज्ञानेश्वर), ईश्वरार्जुन संवाद (परमहंस योगानंद), भगवद्गीता यथारूप (प्रभुपाद स्वामी), भगवद्गीता का सार (स्वामी क्रियानन्द), गीता साधक  संजीवनी (स्वामी रामसुखदास जी), गीता चिंतन (हनुमान प्रसाद पोद्दार), गूढ़ार्थ दीपिका टीका (मधु सूदन सरस्वती), सुबोधिनी टीका (श्रीधर स्वामी), अनासक्ति योग ( महात्मा गांधी), गीता पर निबंध (अरविन्द घोष), गीता रहस्य (बाल गंगाधर तिलक), गीता प्रवचन (विनोबा भावे), गीता तत्व विवेचनी (जयदयाल गोयन्दका), स्वामी चिन्मयानंद की द होली गीता, भगवद्गीता का सार (स्वामी क्रियानन्द ), यथार्थ गीता (स्वामी अड़गड़ानंद जी) विशेष रूप से लोकप्रिय हैं।

'अष्टावक्र गीता' एक अमूल्य ग्रंथ माना जाता है। ग्रंथ में राजा जनक के तीन प्रश्नों की व्याख्या है- ज्ञान कैसे प्राप्त होता है? मुक्ति कैसे होगी और वैराग्य कैसे मिलेगा? ये तीन प्रश्न हर काल में आत्मान्वेषियों द्वारा पूछे जाते रहे हैं। इस ग्रंथ में ज्ञान, वैराग्य और मुक्ति प्राप्त योगी की दशा का वर्णन है। किंवदंती है कि रामकृष्ण परमहंस ने भी यही पुस्तक नरेंद्र को पढ़ने को कही थी, फिर स्वामी विवेकानंद उनके शिष्य बने और कालांतर में स्वामी विवेकानंद के नाम से प्रसिद्ध हुए। इसी तरह गीता के भाष्यों में चर्चित 'अवधूत गीता' भी अद्वैत वेदान्त के सिद्धान्तों पर आधारित है। यह ग्रंथ नाथ योगियों का महत्वपूर्ण ग्रंथ माना जाता है।

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आदि शंकराचर्य के 'गीता भाष्य' में वैदिक कर्मकांड और उपनिषदों के ब्रह्मवाद का अद्भुद समन्वय मिलता है। उपनिषदों के वेदांत तथा बौद्ध और जैन धर्म के संन्यासवाद के समाज में विरक्ति और निवृत्ति के प्रभाव को संतुलित करने के लिए उन्होंने गीता के कर्मयोग की युगानुकूल व्याख्या की। संत ज्ञानेश्वर की 'ज्ञानेश्वरी' में वर्णित ज्ञान एवं भक्ति के समन्वय के साथ नाथ संप्रदाय के योग, कर्म और स्वानुभव की व्याख्या की गई है। यद्यपि, उन्होंने शंकराचार्य के 'गीताभाष्य' के आधार पर अपनी टीका लिखी। इन सिद्धांतों को भागवत धर्म का आधार बताया गया है।
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​'इस्कॉन' के संस्थापक आचार्य श्री ए.सी. भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद की लिखी 'भगवद्गीता यथारूप' की सबसे ज्यादा पढ़ी जाने वाली गीता है। 200 से ज्यादा भाषाओं में इसका अनुवाद हो चुका है। विनोबा भावे के 'गीता प्रवचन' नामक इस ग्रंथ की अद्भुत विवेचना मिलती है। वे लिखते हैं कि गीता का और मेरा संबंध तर्क से परे है। मेरा शरीर मां के दूध पर जितना पला है, उससे कहीं अधिक मेरे हृदय और बुद्धि का पोषण गीता के दूध पर हुआ है। इसी तरह स्वामी श्री रामसुखदास जी द्वारा गीता की  सरल भाषा में टीका 'गीता प्रबोधनी' संस्कृत न जानने वाले व्यक्तियों के लिए बहुत उपयोगी है। इसमें भगवान श्रीकृष्ण के मानव जीवनोपयोगी दिव्य उपदेश संकलित हैं। बाल गंगाधर तिलक कृत 'गीता रहस्य' में भगवान श्रीकृष्ण के  निष्काम कर्मयोग की जो सरल, व्यावहारिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से स्पष्ट व्याख्या मिलती है, वह अपने आप में अद्भुत है।

इस पुस्तक की रचना लोकमान्य जी ने माण्डला जेल (बर्मा) में की थी। वे, अपने समय और समाज के मुताबिक गीता को देखना और समझना चाहते थे। एक थके हुए गुलाम समाज को जगाने के लिए वह गीता को संजीवनी बनाना चाहते थे। जानना दिलचस्प होगा कि इस 'गीता रहस्य' को तिलक ने पांच महीने कारावास अवधि में पेंसिल से लिखा था। इस ग्रंथ में तिलक ने मनुष्य को उसके संसार में वास्तविक कर्तव्यों का बोध कराया है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी  'गीता' के जबरदस्त प्रशंसक थे। वह गीता को अपनी 'माता' कहते थे। उनकी गीता पर टीका 'अनासक्ति योग' भी एक पठनीय ग्रंथ है, जिसमें उपनिषदों का सार निहित है। उन्होंने स्वयं अपने जीवन में अनासक्ति योग का पालन किया।  इसी के बल पर उन्होंने न सिर्फ भारत की राजनीति का नक्शा बदल दिया वरन विश्व को सत्य, अहिंसा, शांति और प्रेम की अजेय शक्ति के दिग्दर्शन कराया। 
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