‘गीता’ जीवन प्रबंधन का महानतम दर्शन है। जो व्यक्ति जीवन का प्रबंधन करना सीख लेगा, वह देश-दुनिया का प्रबंधन भी पूरी सफलता से कर सकेगा। वर्धा आश्रम का एक प्रसंग बताता है कि ‘गीता’ का जीवन में कितना महत्वपूर्ण स्थान हो सकता है।
विनोबा जी की तपस्या से प्रभावित होकर प्रतिष्ठित व्यवसायी और देशभक्त जमनालाल बजाज ने अपने दोनों पुत्रों कमलनयन और राधाकृष्ण को अपने सचिव कृष्णदास जाजू के साथ वर्धा आश्रम में रहने के लिए भेजा। कुछ दिन बाद श्री बजाज और उनकी पत्नी जानकी देवी कृष्णदास जाजू के साथ वर्धा आश्रम आए।
आश्रम आने पर दूर से देखा कि उनके पुत्र अन्य विद्यार्थियों और विनोबा जी के साथ खेतों में काम कर रहे थे। जब तक वे पास पहुंचे, तब तक खेतों का काम खत्म हो चुका था और विनोबा जी सबको साथ लेकर अमराई में आ गए। हाथों में ‘गीता’ की पुस्तक थी। वह गीता की कक्षा शुरू करने वाले थे। उन्हें देखकर जाजू जी ने परिहास में कहा- “विनोबा जी! इन लोगों को तो आगे चलकर व्यवसायिक साम्राज्य की बागडोर संभालनी है।
गीता की कक्षा इन्हें क्या प्रबंधन सिखाएगी?” जाजू के इस कथन पर विनोबा एक पल को चुप रहे, फिर कमलनयन और राधाकृष्ण को निहार कर बोले- “गीता तो जीवन प्रबंधन का महानतम दर्शन है। जो व्यक्ति जीवन का प्रबंधन करना सीख लेगा, वह देश-दुनिया का प्रबंधन भी पूरी सफलता से कर सकेगा। अध्यात्म में यदि वैज्ञानिक दृष्टिकोण भी समाविष्ट कर लिया जाए, तो नए क्षितिज छुए जा सकते हैं।”
गीता में उपदिष्ट कर्मयोग से तो बिना रुके, बिना थके और बिना हारे इसलिए श्रेष्ठतम कर्म किया जा सकता है, क्योंकि मानवीय गुणों का विकास और औरों के गुणों का सही नियोजन, गीता की यह सीख ही प्रबंधन का सर्वोपरि सूत्र है।