क्रांतिकारी राष्ट्रीय संत तरुण सागर जी महाराज का महाप्रयाण पूरी मानवता के लिए एक अपूरणीय क्षति है। उनकी कमी पूरी नहीं की जा सकती। जैन मुनि तरुण सागर जी समाज को कड़वे प्रवचन के माध्यम से जीवन जीने की कला सिखाते थे। उन्हें सभी विचारशील लोग आदर के साथ सुनते थे।
अगस्त 2013 में जयपुर में उनसे मिलने का सुअवसर पर मिला, जब उनके स्वहस्त से तरुणक्रांति पुरस्कार से मुझे नवाजा था। उनके साथ बिताए हुए क्षणों की स्मृति आज भी मेरे दिल में वैसी ही है। वियोग की इस दु:खद घड़ी मैं यही श्रद्धांजलि दे सकता हूँ कि उनके दिखाये मार्ग और बचे कार्य में जो सहयोग गायत्री परिवार कर सकता है, वह सतत करता रहेगा।
- डॉ. प्रणव पण्ड्या प्रमुख, अखिल विश्व गायत्री परिवार