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महाशिवरात्रि से पहले आई है यह खास एकादशी जानें महत्व और कथा

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आज फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि है। शास्त्रों में बताया गया है कि इस एकादशी का नाम विजया एकादशी है।
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पद्म पुराण एवं स्कंद पुराण में कहा गया है कि अपने नाम के अनुसार यह एकादशी विजय प्रदान करने वाली है। जो भी व्यक्ति श्रद्घा भाव से विधि पूर्वक इस एकादशी का व्रत रखता है वह जीवन में आने वाली विपरीत परिस्थितियों पर विजय प्राप्त करने में सफल होता है।

पुराणों में बताया गया है कि, जब नारद मुनि ने ब्रह्मा जी से विजया एकादशी के व्रत के पुण्य के विषय में पूछा तब ब्रह्मा जी ने बताया कि यह एकादशी अत्यंत पुण्यदायी है।
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ब्रह्मा जी ने कहा कि अथाह समुद्र को देखकर सभी वानर सोच में पड़ गये कि समुद्र कैसे पार करेंगे। भगवान राम और लक्ष्मण ने इस गंभीर विषय पर विचार किया और बकदाल्भ्य मुनि के पास पहुंचे। मुनि ने भगवान राम का स्वागत किया और आने का प्रयोजन पूछा। राम ने कहा कि, हमें सेना सहित समुद्र पार करना है, इसके लिए कोई उपाय बताएं।

बकदाल्भ्य मुनि ने राम को विजया एकादशी करने का सुझाव दिया। इस एकादशी के व्रत से कई जन्मों के पाप का प्रभाव कम हो जाता है। भगवान राम ने भी इस एकादशी का व्रत किया था। इसी के पुण्य से वह वानर सेना सहित समुद्र पार करने में सफल हुए।
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एकादशी व्रत की विधि

मुनि ने विजया एकादशी व्रत की विधि बताते हुए कहा कि दशमी के दिन सोने, चांदी, तांबा अथवा मिट्टी का एक कलश स्थापित करके उस कलश को जल से भरें और उसमें पल्लव डालें।

इसके ऊपर भगवान विष्णु का सोने का एक विग्रह स्थापित करें। एकादशी के दिन प्रात: काल स्नान करें। माला, चन्दन, सुपारी तथा नारियल आदि के द्वारा कलश की पूजा करें।

एकादशी के दिन कलश के सामने भगवान की कथाओं का पाठ करें और रात में जागरण करके भजन कीर्तन करें। अगले दिन कलश को जल में प्रवाहित कर दें और कलश पर रखा सामान ब्रह्मण को दान कर दें।

भगवान राम ने इसी विधि से विजया एकादशी का व्रत किया। इस व्रत के प्रभाव से समुद्र पर सेतु निर्माण का कार्य सफल हुआ और राम सेना समेत लंका पहुंचकर रावण पर विजय प्राप्त करने में सफल हुए।
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