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इस मुसलिम परिवार का है मां दुर्गा से गजब का नाता

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नवरात्र शुरु होते ही हर हिन्दू परिवार में मा दुर्गा की विशेष पूजा अर्चना शुरु हो जाती है। पंडालों में मां की भव्य मूर्तियां शोभा पाने लगती है और दस दिनों तक श्रद्घालु भक्ति भाव में डूबकर मां को हर तरह से मनाने में जुटे रहते हैं।
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लेकिन माता के भक्ति सिर्फ हिन्दू ही नहीं हैं। झांसी का एक मुस्लिम परिवार ऐसा है जो पंडाल में जाकर मां की पूजा नहीं करता है और न घर में कलश बैठाकर मां की आराधना करता है। फिर भी यह माता की सेवा में वर्षों से जुटा हुआ है।

इनकी भक्ति और साधना ऐसी है कि कई पंडालों और घरों में मां दुर्गा इनके हाथों की कलाकारी और भक्ति से शोभा पाती है।
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इस तरह कर रहा है यह मां की सेवा

झांसी में सांप्रदायिक सौहार्द्र की मिसाल कायम करते हुए पिता द्वारा शुरू की गई परंपरा को बेटा पूरा करने में लगा है। नगर के प्रमुख स्थानों पर सजने वाली मां दुर्गा की मूर्तियां को पहले मूर्तिकार अब्दुल खालिक तैयार करते थे, अब उस परंपरा को आगे ले जाने का दायित्व उनके पुत्र अब्दुल खलील निभा रहे हैं।

शहर के पुलिया नंबर नौ निवासी अब्दुल खालिक ने फूटा चौपड़ा कालीबाड़ी में बंधव समिति की ओर से आयोजित होने वाली दुर्गा पूजा के लिए मां दुर्गा की प्रतिमा बनाना शुरू किया था। वृंदावन से आए द्विजेंद्रनाथ गांगुली से उन्होंने मूर्ति बनाने की कला सीखी थी।

हालांकि, मूर्ति बनाने पर तब उन्हें अपने ही समाज के लोगों का विरोध भी झेलना पड़ा था, लेकिन उन्होंने कभी किसी की परवाह नहीं की। इस परम्परा को कायम रखा और लगातार 45 साल तक यहां स्थापित होने वाली मूर्ति उन्होंने बनाई। एक अगस्त 2012 को अब्दुल खालिक ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। अब इस परंपरा को उनके पुत्र अब्दुल खलील आगे ले जाने में जुटे हैं।

बकौल अब्दुल खलील, मूर्तियों का निर्माण करने से उन्हें खुशी मिलती है। साल में वह तीन बार मूर्तियां बनाते हैं। नव दुर्गा पर दुर्गा की प्रतिमा, दीपावली पर मां काली और वसंत में मां सरस्वती की प्रतिमा तैयार करते हैं।

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