संस्कृत भाषा की रचना नहीं की गई, खोज की गई। दूसरी तमाम भाषाओं को रचना पड़ा, क्योंकि हर वस्तु, विषय और भाव को एक नाम देना पड़ता था। लेकिन, संस्कृत के साथ ऐसा नहीं है। यह वह भाषा है, जिसमें आकृति और ध्वनि एक दूसरे से संबंधित हैं।
उसके अभ्यास से लगेगा कि पूरा जगत जैसे एक ध्वनि है। वह ध्वनि एक खास आकृति के साथ जुड़ी हुई है। विज्ञान भी इस नतीजे पर पहुंचा है कि पूरा अस्तित्व या जगत ऊर्जा की गूंज है। जहां कहीं भी कंपन है, वहां ध्वनि ही है। जो कुछ भी आकृति में है, उसे ध्वनि में बदल दिया गया है। चुनौती है कि संस्कृत को संरक्षित कैसे किया जाए। इसके लिए जरूरी ज्ञान, समझ और जागरूकता की इन दिनों काफी कमी है। जब संस्कृत भाषा पढ़ाई जाती है, तो लोगों को उसे रटाया जाता है। कोई फर्क नहीं पड़ता कि मतलब समझ आता है या नहीं, सिर्फ ध्वनि महत्वपूर्ण है। यह ध्वनि और आकृति ही हैं, जो आपस में जुड़ रही हैं। बाकी लगभग सभी भाषाएं संस्कृत से ही बनी।