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देवताओं और मनुष्यों का उत्सव माह दीपावली, इस महीने में आएंगे कई बड़े त्योहार

Sun, 04 Nov 2018 03:37 PM IST
सियाराम शरण
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diwali 2018
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देवताओं और मनुष्यों का उत्सव माह कार्तिक त्योहारों का महीना है। साल भर में सबसे ज्यादा त्योहार इसी महीने में आते हैं। इतने ज्यादा कि दिन के हिसाब से गिनती लगाएं, तो पूरे महीने में प्रतिदिन तीन त्योहार आते हैं। इनमें प्रमुख त्योहारों में धनतेरस या धन्वंतरी जयंती, श्री हनुमान जयंती, नरक चौदस, छोटी दीवाली, महालक्ष्मी पूजन, अन्नकूट महोत्सव, गोवर्धन पूजा, भाई दूज, विश्वकर्मा जयंती, षष्ठी व्रत, अक्षय नवमी, देवोत्थानी एकादशी, तुलसी विवाह, भीष्म पंचक, बैकुंठ चतुर्दशी, कार्तिक पूर्णिमा, पुष्कर स्नान और श्री गुरुनानक देव जी की जयंती आदि हैं। प्रत्येक त्योहार का अपना दर्शन और संदेश है। दोनों को मिलाकर देखें, तो धर्म और अध्यात्म का व्यावहारिक संदेश या शिक्षण मिल जाता है। उसके अनुकरण की प्रेरणा खेल-खेल में नहीं उत्सव और उल्लास के माहौल में मिल जाती है।
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स्कंद पुराण में लिखा है कि धर्म का आधार लेकर भी जो धन कमाते हैं, उसका दसवां हिस्सा पुण्य-परमार्थ व ईश्वरीय कार्य में लगाया जाए, तो ही शुद्ध होता है। कई लोग अपनी सुख-सुविधाओं और बच्चों के लिए लाखों रुपये व्यय करते हैं, परंतु धन का त्याग धर्म कार्य हेतु नहीं करते हैं। उनका वही धन दुर्घटना या रोग में स्वतः ही सूद के साथ व्यय हो जाता है। साधना का अर्थ है- तन, मन और धन का त्याग। कहने पर लोग तुरंत कह देते हैं कि तन और मन से क्या कर सकते हैं? जो व्यक्ति स्थूल धन का त्याग नहीं कर सकता, जो ईश्वर प्रदत्त है, वह सूक्ष्म मन, बुद्धि और अहंभाव का क्या त्याग करेंगे।

देव दिवाली
कार्तिक मास की पूर्णिमा को देव दिवाली और इससे पंद्रह दिन पहले, मनाई गई दिवाली को प्राय: सभी जानते हैं, लेकिन देव दिवाली का स्वरूप सामान्य होते हुए भी महत्व असाधारण और विशिष्ट है। लोग इसे त्रिपुरारी पूर्णिमा के नाम से भी जानते हैं। दिवाली के समय भगवान विष्णु निद्रा में लीन होते हैं, इसलिए लक्ष्मी की पूजा उनके बिना ही की जाती है। मान्यता है  कि देवउठनी ग्यारस को भगवान विष्णु के उठने के बाद सभी देवों ने भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की आरती उतारी, इसलिए यही देव दिवाली है। इस दिन गुरु नानक जयंती भी होती है।
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त्रिपुरारी पूर्णिमा
त्रिपुरारी पूर्णिमा के दिन ही भगवान शंकर ने त्रिपुरारी नामक राक्षस का संहार किया था। इस दिन भगवान शंकर को तुलसी और भगवान विष्णु को बेलपत्र अर्पित किया जाता है। इस दिन मंदिरों में दिये जलाए जाते है। देव दिवाली से चार दिन पहले देवोत्थान एकादशी कार्तिक, शुक्ल पक्ष की एकादशी को कहते हैं। दिवाली के बाद आने वाली एकादशी को ही देवोत्थान एकादशी अथवा देवउठान एकादशी या 'प्रबोधिनी एकादशी' कहा जाता है।

देवोत्थान (देव-उठनी) एकादशी
आषाढ़, शुक्ल पक्ष की एकादशी की तिथि को देव शयन करते हैं और कार्तिक,शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन उठते हैं। इसीलिए इसे देवोत्थान (देव-उठनी) एकादशी कहा जाता है। कहा जाता है कि इस दिन भगवान विष्णु, जो  क्षीर सागर में सोए हुए थे, चार माह उपरांत जागे थे। विष्णु जी के शयन काल के चार मासों में विवाहादि मांगलिक कार्यों का आयोजन करना निषेध है। हरि के जागने के बाद ही इस एकादशी से सभी शुभ तथा मांगलिक कार्य शुरू किए जाते हैं। इस दिन तुलसी
और शालिग्राम के विवाह का आयोजन होता है।

तुलसी-शालीग्राम विवाह
तुलसी की कथा सुनकर अक्सर लोग कुतर्क भी करने लगते हैं, लेकिन पौराणिक कथा में कई गहरे दर्शन निहित है। इन कथाओं का चिंतन-मनन करने से जो सार सामने आता है, वह जीवन जीने के तरीके सिखाता है। देवी तुलसी का सत्व महान था, जो उनके असुर पति को अजेय और अमर बनाए हुए था। तुलसी ने पति का साथ न देकर विष्णु का साथ दिया। विष्णु के साथ हास-परिहास भी उनके असुरपति को हार दिला सकता था, उन्होंने परिहास किया। जब वह उसके साथ भस्म हो गईं, तो कहते हैं कि उनके शरीर की भस्म से तुलसी का पौधा बना। यह पौधा भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है। हर भोग को वह तुलसी पत्र के साथ ही स्वीकार करते हैं। उनका पहला नाता उसी से है, बाकी सब तो इस सृष्टि में आने के बाद बने। कभी भी ऐसा धर्म संकट खड़ा हो, तो बिना किसी संदेह के ईश्वर को ही चुने।
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