12 रबीउल-अव्वल इस्लामिक इतिहास की वह महत्वपूर्ण तारीख है, जब अरब के कुरैश खानदान में बीबी आमना के घर एक यशस्वी बालक का जन्म हुआ। बालक का नाम मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम रखा गया। पिता अब्दुल्ला दुनिया से रुखसत हो चुके थे। ऐसे में दादा अब्दुल मुत्तलिब ने मुहम्मद का पालन पोषण किया। होनहार बालक ने बचपन से ही अपनी प्रतिभा से अपने एवं आस-पास के कबीलों में खास पहचान बना ली।
उनके आचरण से प्रभावित होकर लोगों ने उन्हें सादिक, अमीन, सत्यवादी जैसी उपाधियों से नवाजना शुरू कर दिया। अल्लाह ने उन्हें अपना ईशदूत बनाकर लोगों के मार्गदर्शन के लिए दुनिया में भेजा। ईशवाणी के रूप में कुरान की पहली आयत 'इकरा-बिस्मि-रब्बीका खलक...' अर्थात पढ़ो अपने रब के नाम से, जो इस सृष्टि का रचयिता है, के द्वारा कुरान का अवतरण शुरू हुआ।
नियमित रूप से जिबरील अलैहिस्सलाम ईश्वर का पैगाम लेकर मुहम्मद साहब के पास आते थे। अल्लाह के नबी यह संदेश अपने कबीले के लोगों को सुनाते। वह कहते, एक अल्लाह की उपासना करो, जो सारी सृष्टि का रचयिता है। सच बोलो, जीवों पर दया करो, बच्चों से मुहब्बत करो, बड़ों का आदर करो, व्यभिचार से बचो, महिलाओं की रक्षा करो। मुहम्मद साहब जिस समय दुनिया में आए, उस समय अरब में अराजकता फैली थी। लोग अपनी बेटियों को जिंदा दफन कर दिया करते थे। मुहम्मद साहब ने तमाम बुराइयों के खिलाफ आवाज उठाई। लड़कियों के पालन-पोषण पर जन्नत की खुशखबरी दी। महान ईशदूत ने मात्र 23 वर्ष में दुनिया की तस्वीर एवं तकदीर बदल कर रख दी।