यूं भी बनारस की सड़कों पर भीड़ का जो हाल है, वह किसी मेले की भीड़ से कम नहीं है। मैदागिन से चौक और गोदौलिया होते हुए सोनारपुरा निकल जाना किसी चक्रव्यूह से सही-सलामत निकल आने से कम नहीं है। कभी बनारस में लंबे समय तक रहे कवि केदारनाथ सिंह ने कहा था-'अपनी एक टांग पर खड़ा है यह शहर, अपनी दूसरी टांग से बिल्कुल बेखबर', परंपरा और विरासत में अपनी एक टांग धंसाए इस शहर की दूसरी टांग देश-दुनिया में होने वाली हर नई चीज की ओर बढ़ी हुई दिखती है।
जिस रास्ते जाता है शव, उसी रास्ते आता है शव
प्रमुख इलाके नामी ब्रांडों के शोरूम से पटते जा रहे हैं, बड़े बड़े माल और मल्टीप्लेक्स का स्वाद भी शहर के लोगों को खूब लग चुका है। कार्यकाल के आखिरी वर्ष में प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र में विकास और बदलाव के तमाम दावे भी हो रहे हैं। बनारस इनमें शामिल भी है और इनसे अलग भी। वास्तव में बनारस को समझना उसके अन्तरविरोधों और विरोधाभासों को समझना है। बनारस अपने इन्हीं द्वंद्वों के बीच कहीं रहता है-'आधा फूल में, आधा शव में, आधा नींद में, आधा शंख में' और जहां 'जिस रास्ते जाता है शव, उसी रास्ते आता है शव'।
तो इस शहर में दिवाली भी एक महीने की है। शरद पूर्णिमा से कार्तिक पूर्णिमा तक। इस पूरे माह शाम होते ही घाटों पर आकाशदीप जल उठते हैं। यूं तो यहां कई घाटों पर पूरे वर्ष गंगा आरती होती है लेकिन आकाशदीपों का सौन्दर्य देखते ही बनता है। आकाशदीप होते भी बड़े अनूठे हैं और इनका अपना यंत्र है। घाटों पर लंबे-लंबे बांस गाड़े जाते हैं जिनके शिखर पर घिरनी लगी होती है। बेंत की टोकरियों में दीये जलाकर उन्हें रस्सी के सहारे घिरनी के पास बांस के शीर्ष पर ले जाया जाता है। बांसों पर टोकरियों के बीच ये दीये रात भर जलते हैं।
देवता बनारस के घाटों पर आते हैं नहाने
यह क्रम पूरे कार्तिक माह तक चलता है और इनके पीछे कई तरह की आस्थाएं हैं। जमीन से ऊंचाई पर बांसों में दीये जलाने को लेकर लोगों में ऐसी आस्थाएं रही है कि इस माह देवता गंगा नहाने आते हैं, तो कुछ लोग इसे अपने पूर्वजों के लिए जलाते हैं। आस्थाएं तर्क नहीं मानतीं लेकिन इनसे गंगा तट पर एक अनूठा दृश्य जरूर रच जाता है। इधर शहीदों की याद में भी आकाशदीप जलाए जाने लगे हैं। और जब बनारस की इस एक माह का समापन कार्तिक पूर्णिमा पर होता है तो वह एक अविस्मरणीय अवसर होता है। राजघाट से लेकर अस्सी घाट तक की सीढ़ियों पर दीये सज जाते हैं, चारो ओर दीये ही दीये जल उठते हैं और नगर दिवाली के एक पखवारे बाद देव दिवाली मनाता है।
ऐसा लगता है जैसे पूरा नगर गंगा किनारे जुट आया हो। संगीत और खासकर शास्त्रीय-उपशास्त्रीय संगीत की सुर लहरियां इस पूरे दृश्य को और भी मोहक बना देती हैं। वैसे भी जब शास्त्रीय संगीत को लेकर जो तमाम चिंताएं व्यक्त की जाती रही हैं, बनारस एक ऐसा नगर है जो इसे लेकर आश्वस्त करता है। शायद ही यहां कोई ऐसी शाम गुजरती हो, जब शास्त्रीय-उपशास्त्रीय संगीत की महफिल यहां न सजती हो। संकटमोचन संगीत समारोह जैसे यहां रात भर चलने वाले संगीत आयोजनों का इंतजार तो विश्व भर के कलाकार और संगीतप्रेमी करते हैं।
यह उत्सव करीब तीन दशक पुराना
बनारस के देव दिवाली के इस पूरे उत्सव की खास बात यह है कि इसे लोगों ने शुरू किया और बढ़ाया है। अयोध्या में जब ऐसा ही उत्सव आयोजित करने के लिए प्रदेश सरकार के तमाम विभागों और संसाधनों को लगाना पड़ता है, बनारस का यह उत्सव करीब तीन दशक पहले कुछ उत्साही लोगों के प्रयासों से शुरू हुआ। नारायण गुरु नामक एक सामाजिक कार्यकर्ता ने युवाओं की टोली बनाकर कुछ घाटों से इसकी शुरूआत की और फिर धीरे-धीरे दूसरे घाटों तक यह फैलता हुआ करीब एक दशक पूर्व अपने ऐसे भव्य रूप में आ चुका है जब इस दिन यहां होटलों में जगह नहीं होती और नौकाओं की दरें कई गुना बढ़ जाती है।
इस उत्सव की भव्यता का लाभ लेने के लिए प्रदेश सरकार ने कई वर्षों से इससे गंगा महोत्सव को भी जोड़ दिया। इस बार तो देव दिवाली में सरकारी आयोजनों, राजनेताओं की भागीदारी और बढ़ने वाली है। लेकिन इस पूरे उत्सव का एक नकारात्मक पहलू यह है कि गंगा तट के इस उत्सव में गंगा की चिंता कहीं खो सी गई है। गंगा लगातार प्रदूषित होती दिख रही है, दुबली होती, विकास के मैल को जज्ब करती हुई। इस शहर में लंबे समय से रह रहे 'गंगा के जल दर्पण और एक गांगेय नगर के मन-दर्पण में अपने समय के अक्स' देखने वाले वरिष्ठ कवि ज्ञानेंद्रपति ठीक ही कहते हैं-'नदी मर रही है और वे बजरे पर बुढ़वा मंगल मना रहे हैं।'
लेखक- वरिष्ठ पत्रकार और कला समीक्षक हैं