4 अप्रैल वैशाख शुक्ल पंचमी तिथि के दिन केदारनाथ की पावन शुरु हो रही है। केदारनाथ का मार्ग यूं तो पहले से ही दुर्गम माना जाता था। लेकिन बीते साल आए जल प्रलय के बाद स्थिति और भी बुरी हो गई।
इसके बावजूद शास्त्रगत नियम के अनुसार केदारनाथ का कपाट अक्षय तृतीया के दूसरे दिन खोल दिया गया है और भक्त भी बाबा केदारनाथ की यात्रा के लिए आ रहे हैं।
केदारनाथ के प्रति श्रद्घा का कारण क्या है?
इस साल कपाट खुलने के दिन भक्तों की उतनी संख्या तो नहीं है जो बीते साल या त्रसादी से पहले हुआ करती थी। लेकिन ऐसा नहीं है कि बाबा के द्वार पर भक्तों ने आना ही छोड़ दिया है।
आस्था और विश्वास से भरे भक्त कठिन मार्ग और जोखिम के बावजूद केदारनाथ के जयकारे लगाते चले आ रहे हैं। आखिर केदारनाथ के प्रति इस श्रद्घा का कारण क्या है?
सतयुग में भगवान शिव बने केदारनाथ
पुराणों में भगवान शिव के कई नामों में एक नाम केदारनाथ भी बताया गया है। केदारनाथ बारह ज्योर्तिलिंगों में से एक माने जाते हैं। इनका यह नाम सतयुग के समय पड़ा और तब से आज तक उत्तराखंड की पवित्र भूमि पर भगवान शिव केदारनाथ नाम से हिमालय की ऊंची चोटी पर विराजमान हैं।
पुराणों में वर्णित कथा के अनुसार सतयुग में भगवान विष्णु ने नर और नारायण के रूप में अवतार लिया। अलकनंदा नदी के दोनों किनारों पर मौजूद नर और नारायण पर्वत पर इन्होंने घोर तपस्या की।
केदारनाथ के दर्शन का महत्व
नर नारायण की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए। विष्णु के अवतार होने के कारण इन्हें किसी सांसारिक फल की चाहत नहीं थी। इसलिए जब भगवान शिव ने कहा कि वर मांगो, तब नर और नारायण ने कहा कि आप इस क्षेत्र में निवास करें। जो भी भक्त यहां आएं उसे जीवन मरण के चक्र से मुक्ति प्रदान करें।
नर और नारायण की प्रार्थना पर भगवान शिव ने कहा कि यहां ज्योर्तिलिंग प्रकट होगा जो साक्षात शिव रूप होगा। इसके दर्शन करने से शिव दर्शन करने का पुण्य प्राप्त होगा। नर और नारायण की प्रार्थना पर ज्योर्तिलिंग प्रकट हुआ। जहां पर शिव का ज्योर्तिलिंग प्रकट हुआ वहां केदार नामक धर्मप्रिय राजा का शासन था।
राजा केदार के नाम पर यह क्षेत्र केदारखंड कहलाता था। राजा केदार भगवान शिव के भक्त थे। राजा केदार और केदारखंड के रक्षक के रूप में भगवान शिव का ज्योर्तिलिंग प्रकट होने के कारण भगवान शिव केदारनाथ कहलाये। पुराणों में बताए केदारनाथ के इन्हीं महत्व के कारण भक्त जीवन का मोह त्याग कर केदारनाथ के दर पर पहुंचते हैं।