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बुद्ध जयंती 2020: बुद्ध पूर्णिमा आज, जानिए भगवान बुद्ध के बारे में खास बातें

Thu, 07 May 2020 12:33 AM IST
विनोद शुक्ला धर्म डेस्क, अमर उजाला
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बुद्ध पूर्णिमा 2020: भगवान बुद्ध ने चार आर्य सत्यों का उपदेश दिया था।
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वैशाख पूर्णिमा को बौद्ध धर्म के संस्थापक भगवान गौतम बुद्ध की जयंती के रूप में मनाई जाती है। हिंदू और बौद्ध धर्म में वैशाख पूर्णिमा का विशेष महत्व होता है। वैशाख महीने की पूर्णिमा तिथि पर भगवान बुद्ध का जन्म हुआ था। हिंदू धर्म के अनुयायी भगवान बुद्ध को भगवान विष्णु का नौवां अवतार मानते हैं। वैसे तो बौद्ध धर्म की नींव भारत में पड़ी, लेकिन भारत के अलावा विश्व के कई देशों में भी बौद्ध धर्म के अनुयायी रहते हैं।  जिसमें प्रमुख रूप से जापान, दक्षिण कोरिया, उत्तर कोरिया, चीन, वियतनाम, ताइवान, थाईलैंड, कंबोडिया, हांगकांग, मंगोलिया, तिब्बत, भूटान, म्यांमार और श्रीलंका में है। बुद्ध पूर्णिमा के मौके पर आइए जानते हैं भगवान गौतम बुद्ध और बौद्ध धर्म से जुड़ी कुछ प्रमुख बातें...
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वैशाख पूर्णिमा-
हिंदू कैलेंडर के अनुसार  वैशाख पूर्णिमा के दिन बुद्ध का जन्म नेपाल के लुम्बिनी मे हुआ था। बोधगया में ही पूर्णिमा तिथि पर भगवान बुद्ध को सत्य का ज्ञान प्राप्त हुआ था।

गौतम बुद्ध का पारिवारिक जीवन-
भगवान गौतम बुद्ध के बचपन का नाम सिद्धार्थ रखा गया। इनके पिता कपिलवस्तु के राजा शुद्धोदन था और माता का नाम महामाया देवी था। सिद्धार्थ के जन्म के मात्र सात दिन बाद ही इनकी मां की मृत्यु हो गई थी। मां की मृत्यु के बाद इनकी मौसी ने इनका लालन-पालन किया। गौतम बुद्ध का विवाह यशोधरा के साथ विवाह हुआ और राहुल नाम का एक पुत्र हुआ। यशोधरा और राहुल दोनों बुद्ध के भिक्षु हो गए थे।
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बुद्ध के विषय में भविष्यवाणी-
गौतम बुद्ध के जन्म के बाद उनके पिता के समक्ष एक ज्योतिषी और भविष्यवक्ता ने सिद्धार्थ के बारे में भविष्यवाणी की थी कि यह बालक चक्रवर्ती सम्राट बनेगा या फिर बहुत बड़ा वैरागी। इसकी ख्याति पूरे विश्व में अनंतकाल तक रहेगी। पिता शुद्धोदन सिद्धार्थ को चक्रवर्ती सम्राट बनाना चाहते थे, इसलिए उनके सामने भोग-विलास की सारी सुख सुविधा उन्हें प्रदान की। लेकिन अंत में उन्होंने वैराग को ही चुना।

मन वैराग्य भाव कब पैदा हुआ-
एक बार नगर भ्रमण के दौरान रास्ते में पहली बार उन्होंने एक वृद्ध, एक रोगी, एक अर्थी और एक संन्यासी को देखा। इन सबके बारे में उन्होंने अपने सारथी से पूछा। सारथी ने कहा कि हर व्यक्ति के जीवन में बुढ़ापा आने पर वह रोगी हो जाता है और रोगी होने के बाद मृत्यु को प्राप्त करता है। संन्यासी के बारे में पूछने पर सारथी ने कहा कि संन्यासी ही है जो मृत्यु के पार जीवन की खोज में निकलता है। फिर क्या था सिद्धार्थ ने सभी तरह के भोग-विलास के जीवन को त्याग कर वैराग्य का रास्ता चुनने का निर्णय किया। 27 वर्ष की आयु में उन्होंने संन्यास ग्रहण कर लिया।
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सिद्धार्थ से गौतम बुद्ध
जब सिद्धार्थ 35 वर्ष के थे। भारत के बिहार में बोधगया में पेड़ की नीचे ज्ञान की प्राप्ति की। आज भी वह वटवृक्ष है जिसे अब बोधीवृक्ष कहा जाता है।
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