चराचर जगत के सभी प्राणियों के शरीर से एक विशेष प्रकार की 'गंध' प्रतिक्षण निकलती रहती है जिसे पौराणिक भाषा में 'अथर्वासूत्र' कहते हैं। इस गंध की अधिष्ठात्री देवी माँ बगलामुखी हैं। भगवान शिव द्वारा प्रकट की गई दस महाविद्याओं में प्रमुख बगलामुखी को पुराणों में मारण, मोहन, उच्चाटन, विद्वेषण और शत्रुओं का शमन करने वाली देवी के रूप में जाना जाता है। यही माँ बगलामुखी जीव के शुभा-शुभ कर्मो के अनुसार गंधरूप में प्रतिपल प्रवाहित होती हैं।
मनुष्यों की तुलना में जानवरों भालू, शियार, लकड़बग्घे, कुत्ते आदि में में यह गंध और भी तीव्र निकलती है, जिसके द्वारा मीलों दूर से ये जीव सड़े-गले मांस की दुर्गन्ध इन्हें मिल जाती है और सहज भाव से वहाँ पहुच जाते हैं। मनुष्यों की तुलना में कुत्तों में ये अथर्वासूत्र सौ गुना अधिक निकलता है जिसके कारण कुत्ते नशीले पदार्थों, विस्फोटक पदार्थों, तस्करों और चोरों को पहचान लेता है। लाखों के झुण्ड में रहने वाले एक ही रंग के पशु-पक्षी भी अपने-अपने परिवार को पहचान लेते हैं, गंध की संख्या लाखों में हैं जंगली जीव भी अपना इलाका विशेष प्रकार की गंध छोड़कर निर्धारित करते हैं। जानवरों की अपेक्षा मनुष्यों में यह गंध पहचानने की क्षमता काफी कम होती है।
मनुष्यों के शरीर से निकलने वाली गंधे जिससे आप व्यक्ति के स्वभाव के साथ-साथ भाग्य के विषय में भी जानकारी हासिल कर सकते हैं। जिन प्राणियों के शरीर से चन्दन, कस्तूरी, केवडा, मोगरा, गुलाब, और कपूर की तरह गंध निकलती है, उन्हें सात्विक प्राणी माना गया है ऐसे लोग धर्म-कर्म में रूचि रखने वाले, दूसरों की सेवा करके प्रसन्न रहने वाले समाज में उच्च मुकाम हासिल करते हैं।
ज्ञान की खोज एवं पठन-पाठन में रूचि रखने वाले ऐसे लोग समाज सेवा के प्रति समर्पित रहते हुए अपने माता-पिता एवं परिवार के अन्य बुजुर्गों की सेवा करके प्रसन्न रहते हैं। कर्तव्यों के प्रति समर्पण इनकी नियति रहती है ऐसे लोगों से चाहे वे स्त्री हों या पुरुष हों मित्रता लंबे समय तक रहती है। केवल कीड़े-मकोड़े छोटे बड़े जानवरों को ही नहीं अपितु पति/पत्नी अथवा प्रेमी/प्रेमिका के मध्य दैहिक भाषा का संकेत समझाने में गंध की प्रमुख भूमिका रहती है। सहज आकर्षण उत्पन्न कराने वाली इस प्रकार की गंध सुखद दाम्पत्य जीवन के लिए वरदान की तरह होती है।