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Bhadrapada Amavasya 2025: भाद्रपद अमावस्या पर करें विशेष स्तोत्र का पाठ, सुख-समृद्धि और शांति मिलेगी

Sat, 23 Aug 2025 07:08 AM IST
श्वेता सिंह धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

Bhadrapad Amavasya: भाद्रपद अमावस्या 2025, शनिवार 23 अगस्त को है। इस दिन गंगा स्नान, पिंडदान, तर्पण और दान-पुण्य करने से पितरों की आत्मा को शांति मिलती है, पितृ दोष दूर होता है और जीवन में सुख-समृद्धि आती है।
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pithori amavasya - फोटो : adobe stock
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विस्तार
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Bhadrapada Amavasya 2025: भाद्रपद अमावस्या 2025 इस साल शनिवार, 23 अगस्त को पड़ रही है। वैदिक पंचांग के अनुसार यह तिथि बेहद शुभ मानी गई है। इस दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु गंगा सहित पवित्र नदियों में स्नान करके पुण्य अर्जित करते हैं और भगवान शिव का गंगाजल से अभिषेक करते हैं। परंपरा के अनुसार इस दिन पिंडदान, तर्पण और दान-पुण्य करना अत्यंत फलदायी होता है। मान्यता है कि इन कर्मों से पूर्वजों की आत्मा को शांति मिलती है और परिवार से दुख-दर्द और कष्ट दूर होते हैं।

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Pithori Amavasya 2025: कब है पिठोरी अमावस्या 2025? जानें स्नान-दान का शुभ मुहूर्त, पूजन-विधान और मान्यताएं
भाद्रपद अमावस्या को पितरों की कृपा पाने का विशेष अवसर माना गया है। इस दिन पिंडदान और श्राद्ध के साथ-साथ विशेष पूजा करने से पितृ दोष का निवारण होता है। साथ ही, जीवन में सुख-समृद्धि, शांति और सौभाग्य का आगमन होता है। मान्यता है कि इस पावन दिन पर भक्तजन यदि श्रद्धा से स्तोत्र या चालीसा का पाठ करें, तो पूर्वज प्रसन्न होते हैं और परिवार पर अपना आशीर्वाद बनाए रखते हैं।

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pithori amavasya - फोटो : adobe stock
दोहा

विष्णु सुनिए विनय सेवक की चितलाय ।
कीरत कुछ वर्णन करूं दीजै ज्ञान बताय ॥

विष्णु चालीसा

नमो विष्णु भगवान खरारी, कष्ट नशावन अखिल बिहारी ।
प्रबल जगत में शक्ति तुम्हारी, त्रिभुवन फैल रही उजियारी ॥

सुन्दर रूप मनोहर सूरत, सरल स्वभाव मोहनी मूरत ।
तन पर पीताम्बर अति सोहत, बैजन्ती माला मन मोहत ॥

शंख चक्र कर गदा विराजे, देखत दैत्य असुर दल भाजे ।
सत्य धर्म मद लोभ न गाजे, काम क्रोध मद लोभ न छाजे ॥

सन्तभक्त सज्जन मनरंजन, दनुज असुर दुष्टन दल गंजन ।
सुख उपजाय कष्ट सब भंजन, दोष मिटाय करत जन सज्जन ॥

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पाप काट भव सिन्धु उतारण, कष्ट नाशकर भक्त उबारण ।
करत अनेक रूप प्रभु धारण, केवल आप भक्ति के कारण ॥

धरणि धेनु बन तुमहिं पुकारा, तब तुम रूप राम का धारा ।
भार उतार असुर दल मारा, रावण आदिक को संहारा ॥

आप वाराह रूप बनाया, हिरण्याक्ष को मार गिराया ।
धर मत्स्य तन सिन्धु बनाया, चौदह रतनन को निकलाया ॥

अमिलख असुरन द्वन्द मचाया, रूप मोहनी आप दिखाया ।
देवन को अमृत पान कराया, असुरन को छवि से बहलाया ॥

कूर्म रूप धर सिन्धु मझाया, मन्द्राचल गिरि तुरत उठाया ।
शंकर का तुम फन्द छुड़ाया, भस्मासुर को रूप दिखाया ॥

वेदन को जब असुर डुबाया, कर प्रबन्ध उन्हें ढुढवाया ।
मोहित बनकर खलहि नचाया, उसही कर से भस्म कराया ॥

असुर जलन्धर अति बलदाई, शंकर से उन कीन्ह लड़ाई ।
हार पार शिव सकल बनाई, कीन सती से छल खल जाई ॥

सुमिरन कीन तुम्हें शिवरानी, बतलाई सब विपत कहानी ।
तब तुम बने मुनीश्वर ज्ञानी, वृन्दा की सब सुरति भुलानी ॥

देखत तीन दनुज शैतानी, वृन्दा आय तुम्हें लपटानी ।
हो स्पर्श धर्म क्षति मानी, हना असुर उर शिव शैतानी ॥

तुमने ध्रुव प्रहलाद उबारे, हिरणाकुश आदिक खल मारे ।
गणिका और अजामिल तारे, बहुत भक्त भव सिन्धु उतारे ॥

हरहु सकल संताप हमारे, कृपा करहु हरि सिरजन हारे ।
देखहुं मैं निज दरश तुम्हारे, दीन बन्धु भक्तन हितकारे ॥

चाहता आपका सेवक दर्शन, करहु दया अपनी मधुसूदन ।
जानूं नहीं योग्य जब पूजन, होय यज्ञ स्तुति अनुमोदन ॥

शीलदया सन्तोष सुलक्षण, विदित नहीं व्रतबोध विलक्षण ।
करहुं आपका किस विधि पूजन, कुमति विलोक होत दुख भीषण ॥

करहुं प्रणाम कौन विधिसुमिरण, कौन भांति मैं करहु समर्पण ।
सुर मुनि करत सदा सेवकाई, हर्षित रहत परम गति पाई ॥

दीन दुखिन पर सदा सहाई, निज जन जान लेव अपनाई ।
पाप दोष संताप नशाओ, भव बन्धन से मुक्त कराओ ॥

सुत सम्पति दे सुख उपजाओ, निज चरनन का दास बनाओ ।
निगम सदा ये विनय सुनावै, पढ़ै सुनै सो जन सुख पावै ॥

॥ इति श्री विष्णु चालीसा ॥



डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। 
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