दस महाविद्याओं में प्रमुख आठवीं महाविद्या मां 'बगला' मुखी का अवतरण (वैशाख शुक्ल अष्टमी) जिस ग्रह योग (रविपुष्य योग) में हो रहा है वह भी सुखद और अत्यंत शुभ है।
रवि पुष्य योग को सभी कार्यों में सफलता दिलाने वाला बलवान योग माना जाता है। इस योग में मां की आराधना तथा दान-पुण्य, जप-तप का फल अमोघ रहेगा। मां की कृपा फलदायी होती है। उनका ध्यान जीवन के कष्टों को हरने वाला है।
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कथा है कि एक बार महाविनाशक तूफान से सृष्टि नष्ट होने लगी। प्राणियों की रक्षा करना असंभव हो गया। चारों ओर हाहाकार मच गया। यह महाविनाशक तूफान सब कुछ नष्ट करता हुआ आगे बढ़ता जा रहा था, जिसे देखकर पालनकर्ता विष्णु चिंतित हो गए।
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उन्होंने शिव का स्मरण किया। शिव ने कहा कि शक्ति के अतिरिक्त अन्य कोई इस विनाश को रोक नहीं सकता अतः आप शक्ति का ध्यान करें। विष्णु जी ने 'महात्रिपुरसुंदरी' को ध्यान द्वारा प्रसन्न किया।
देवी विष्णु जी की साधना से प्रसन्न हो सौराष्ट्र क्षेत्र की हरिद्रा झील में जलक्रीड़ा करती हुई प्रकट हुई। अपनी शक्ति के जरिए उन्होंने उस महाविनाशक तूफान को रोक दिया। इसके साथ ही विष्णु जी को इच्छित वर दिया।
मां का 36 अक्षरों वाला यह मंत्र 'ॐ ह्लीं बगलामुखी सर्वदुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तंभय जिह्वां कीलय बुद्धि विनाशय ह्लीं ॐ स्वाहा'। शत्रुओं का सर्वनाश कर साधक को विजयश्री दिलाकर चिंता मुक्त कर देता है। यह जरूरी है कि मंत्र का जप करते समय पवित्रता का विशेष ध्यान रखें।
पीले वस्त्र पहनकर पीले आसन पर बैठकर ही मंत्रों का जाप करें। हल्दी की माला का ही प्रयोग करें। जप करने से पहले बगलामुखी कवच का पाठ अवश्य करें।