Akshaya Tritiya 2020: अक्षय तृतीया का पर्व हिन्दू धर्म का महत्वपूर्ण पर्व है। इस वर्ष यह त्योहार 26 अप्रैल को पड़ रहा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, अक्षय तृतीया के दिन पवित्र नदी में स्नान करने से, पूजा-पाठ और दान-पुण्य के कार्य करने से अक्षय फल की प्राप्ति होती है। जैन समुदाय में भी अक्षय तृतीया पर्व विशेष महत्व रखता है। इस दिन जैन समुदाय के लोग भी उपवसा रखते हैं। आइए जानते हैं अक्षय तृतीया पर्व का जैन पंथ में क्या महत्व है।
जैन धर्म की मान्यता के अनुसार, भगवान ऋषभनाथ (प्रथम तीर्थंकर) ने एक वर्ष की तपस्या करने के बाद वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि अर्थात अक्षय तृतीया के दिन इक्षु रस (गन्ने का रस) से अपनी तपस्या का पारण किया था। इस कारण जैन समुदाय में यह दिन विशेष माना जाता है।
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जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभनाथ का जन्म चैत्र कृष्ण की नवमी तिथि के दिन हुआ था। उन्हें भगवान आदिनाथ के नाम से भी जाना जाता है। उन्होंने अपने सांसारिक जीवन में वर्षों तक सुखपूर्वक राज्य किया। फिर अपने पांच पुत्रों के बीच राज्य का बंटवारा कर वे सांसारिक जीवन को त्यागकर दिगंबर तपस्वी बन गए।
उन्होंने कैवल्य प्राप्त करने के लिए एक वर्षों तक भूखे रहकर तपस्या की। इस तपस्या के दौरान हस्तिनापुर में उनके पौत्र श्रेयांश ने उन्हें गन्ने का रस भेंट किया और इसे पीकर उन्होंने अपनी तपस्या को समाप्त किया। कैवल्य प्राप्त करने के बाद वे जिनेन्द्र बन गए।
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इसी मान्यता को लेकर हस्तिनापुर में आज भी अक्षय तृतीया का उपवास गन्ने के रस से तोड़ा जाता है। यहां इस उत्सव को पारण के नाम से जाना जाता है। हिन्दू धर्मावलंबी भगवान ऋषभनाथ को भगवान विष्णु का अवतार मानते हैं।
क्षय तृतीया का मुहूर्त
तृतीया तिथि प्रारंभ: 11:50 बजे (25 अप्रैल 2020)
तृतीया तिथि समापन: 13:21 बजे (26 अप्रैल 2020)
अक्षय तृतीया पर दान का महत्व
अक्षय तृतीया दान और पुण्य कमाने के लिए सबसे शुभ तिथि मानी गई है। मान्यता है कि इस तिथि पर दान करने से फल कभी नष्ट नहीं होता। इस दिन गंगा स्नान, पितरों को तर्पण और गरीबों को भोजन करवाने से शुभ फल की प्राप्ति होती है।