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Aja Ekadashi 2025: श्रीहरि की कृपा पाने का दिव्य माध्यम, जानिए अजा एकादशी की महिमा, पूजाविधि और कथा

Tue, 19 Aug 2025 07:28 AM IST
विनोद शुक्ला धर्म डेस्क, अमर उजाला

सार

भाद्रपद माह के कृष्णपक्ष की एकादशी का नाम 'अजा' है। धर्मराज युधिष्ठिर के पूछने पर भगवान श्री कृष्ण अजा एकादशी की महिमा बताते हुए कहते हैं कि 'यह एकादशी प्राणी के सभी पापों का नाश करने वाली है।
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अजा एकादशी 2025 - फोटो : adobe stock
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विस्तार
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अजा एकादशी का व्रत हर साल भाद्रपद महीने में एकादशी तिथि को मनाया जाता है। इस साल यह व्रत 19 अगस्त, 2025 को पड़ रहा है। आध्यात्मिक दृष्टि से यह व्रत भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने का सशक्त माध्यम है। ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार जैसे देवताओं में श्री कृष्ण, देवियों में प्रकृति, वर्णों में ब्राह्मण तथा वैष्णवों में भगवान शिव श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार व्रतों में एकादशी व्रत श्रेष्ठ है। मान्यता है कि यह व्रत मन को निर्मल बनाकर बुद्धि को स्थिर रखता है।

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अजा एकादशी की महिमा
भाद्रपद माह के कृष्णपक्ष की एकादशी का नाम 'अजा' है। धर्मराज युधिष्ठिर के पूछने पर भगवान श्री कृष्ण अजा एकादशी की महिमा बताते हुए कहते हैं कि 'यह एकादशी प्राणी के सभी पापों का नाश करने वाली है। जो व्यक्ति भगवान ऋषिकेश का पूजन करके इस व्रत का भक्ति-भाव से पालन करता है, वह इस लोक में सुख भोगकर अंत में विष्णुलोक में जाता है। इस व्रत का फल अश्वमेघ यज्ञ, कठिन तपस्या, तीर्थों में दान-स्नान आदि से मिलने वाले फलों से भी अधिक होता है।'

श्रीहरि को प्रसन्न करने की विधि
श्री गणेश, सूर्य, अग्नि, विष्णु, शिव तथा पार्वती इन सबकी पूजा और वंदना करके श्री हरि का स्मरण करते हुए व्रत करें। भगवान विष्णु का मां लक्ष्मी के साथ गोपी चन्दन, अक्षत, पीले पुष्प, ऋतु फल, मंजरी सहित तुलसी दल एवं धूप-दीप से पूजन करें। इस दिन विष्णु सहस्रनाम, भगवद गीता का पाठ व विष्णु मंत्रों का जाप करने से श्री नारायण की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
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अजा एकादशी की कथा
पूर्वकाल में हरिश्चंद्र नाम के चक्रवर्ती राजा हुए, जो समस्त भूमण्डल के स्वामी और सत्यप्रतिज्ञ थे। एक समय प्रभु इच्छा से उन्होंने अपना राज्य एक ऋषि को दान कर दिया। परिस्थितिवश अपनी पत्नी और पुत्र को भी बेचना पड़ा। स्वयं वह एक चाण्डाल के दास बन गए। वे मुर्दों का कफ़न लिया करते थे। इतने पर भी नृपश्रेष्ठ सत्य से विचलित नहीं हुए। जब इसी प्रकार कई वर्ष बीत गये तो उन्हें अपने इस नीच कर्म पर बड़ा दुःख हुआ और वह इससे मुक्त होने का उपाय खोजने लगे।
एक बार गौतम ऋषि उनके पास आए। हरिश्चन्द्र ने उन्हें प्रणाम किया और अपनी दुख-भरी कथा सुनाई। राजा हरिश्चन्द्र की बातें सुनकर महर्षि गौतम भी अत्यंत दुखी हुए और उन्होंने राजा से कहा- 'हे राजन! भादों के कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम अजा है। तुम उस एकादशी का विधानपूर्वक व्रत तथा रात्रि में जागरण करो। इससे तुम्हारे सभी कष्ट दूर हो जाएंगे।' महर्षि गौतम इतना कह कर चले गये।
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अजा नाम की एकादशी आने पर राजा हरिश्चन्द्र ने महर्षि के कहे अनुसार विधि-विधान से व्रत का पालन किया। इस व्रत के पुण्य से राजा सभी दुखों से पार हो गये। आकाश में दुन्दुभियाँ बजने लगीं एवं देवलोक से पुष्पों की वर्षा होने लगी। उन्होंने अपने सामने ब्रह्मा, विष्णु, महेश तथा देवेन्द्र आदि देवताओं को खड़ा पाया एवं अपने मृतक पुत्र को जीवित तथा अपनी पत्नी को राजसी वस्त्र, आभूषणों से परिपूर्ण देखा। राजा को पुनः अपने राज्य की प्राप्ति हो गई। वास्तव में एक ऋषि ने राजा की परीक्षा लेने के लिए यह सब कौतुक किया था, परन्तु अजा एकादशी के व्रत के प्रभाव से ऋषि द्वारा रची गई सारी माया समाप्त हो गई और अन्त समय में हरिश्चन्द्र अपने परिवार सहित विष्णु धाम को चले गए।

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