अलंकार हिंदू संस्कृति की अनमोल धरोहर है। समय के परिवर्तन के साथ हिंदू संस्कृति पर पश्चिमी संस्कृति का रंग चढा। अलंकार रूपी धरोहर की ओर अनदेखी होने लगी। केवल हिंदू संस्कृति में इस प्रकार सिर, बाल, कान, नाक, गर्दन, हाथ, उंगलियों, कमर तथा पैर में गहने पहनने की परंपरा है। इसके अतिरिक्त, हिंदू धर्म में स्त्रियों को विशिष्ट अवसरों पर विशिष्ट अलंकार धारण करने की सलाह दी जाती है। जैसे विवाह समारोह और त्योहारों के समय में बाजूबंद और कमरबंद पहनना। ये आभूषण प्रदर्शन या सुख पाने की वस्तुएं नहीं हैं, अपितु स्त्रियों को चैतन्य (दिव्य चेतना) प्रदान करने के लिए एवं उनमें देवत्व को सक्रिय करने का एक महत्त्वपूर्ण माध्यम हैं। हिंदू संस्कृति में सम्पूर्ण शरीर पर अलंकार धारण करने की परंपरा के महत्त्व को समझा जा सकता है। यह केवल हिंदू संस्कृति की महानता को दिखाता है जो हर चरण पर मानवता के आध्यात्मिक कल्याण के बारे में सोचता है। अलंकार धारण करने का महत्त्व इस लेख में समझ लेंगे।
1. हिंदू धर्म में अलंकृत होना एक प्रमुख आचार - अलंकार के बिना आकार तेजोमय नहीं। आकार के बिना क्रिया नहीं। क्रिया के बिना प्रकृति नहीं और प्रकृति के बिना माया नहीं। मायारूपी विश्व को चैतन्यमय बनाने के लिए अलंकारों की आवश्यकता होती है।
2. अलंकारों द्वारा तेजस्विता एवं प्रसन्नता प्रदान होना- अलंकारों के स्पर्श से देह की चेतना जागृत होती है। चेतना से देह में सजगता आती है। सजगता से देह सात्त्विक तेज रूपी तरंगें ग्रहण कर संवेदनशील बनता है। इस संवेदनशीलता से ही तेजस्विता आती है। तेजस्विता से देवत्व आता है एवं देवत्व से प्रसन्नता आती है। प्रसन्नता से आनंदरूप ईश्वरीय तत्त्व का बोध होता है। ईश्वरीय तत्त्व के आकलन से मोक्ष प्राप्त हो सकता है।
3. तारक एवं मारक तत्त्व- मुखमंडल का तथा दमकने वाले अलंकारों का आह्लादयुक्त तेज, वायुमंडल के रज-तमात्मक कणों का नाश करता है, इसलिए वह तारक अर्थात देवत्व प्रदान करने वाला है और मारक अर्थात अनिष्ट शक्तियों को नष्ट करने वाला है।
4. सौंदर्यवृद्धि के लिए अलंकार उपयुक्त - मनुष्य को अपनी देह के प्रति आसक्ति रहती है। देह को सजाने के लिए अर्थात अपने सौंदर्य में वृद्धि करने के लिए अलंकार धारण किए जाते हैं।
5. अलंकार धारण करने से देवता की तरंगें ग्रहण कर पाना- देवताओं द्वारा अलंकार धारण किए जाने से देवताओं से प्रक्षेपित तरंगें अलंकारों के माध्यम से व्यक्ति के लिए ग्रहण करना संभव होना होता है, भक्तों के लिए देवता का तेज सहज उपलब्ध करने का साधन है अलंकार। देवताओं से प्रक्षेपित तरंगें ग्रहण करना संभव हो, इसलिए देवता भी अलंकारों सहित होना - कलियुग में जीव की कुल सात्त्विकता अल्प है। इसलिए जीवों को अलंकार जैसे बाह्य माध्यमों का उपयोग हो, उसी प्रकार देवताओं से प्रक्षेपित तरंगों को भी अलंकारों के माध्यम से सगुणता प्राप्त हो तथा ऐसा तत्त्व सामान्य व्यक्ति के लिए ग्रहण करना सरल हो, इस उद्देश्य से ईश्वर ने सामान्य जनों के लिए प्रत्येक देवता के रूप की निर्मित अलंकारों सहित की। अतः हिंदू धर्म में देवता का पूजन करते समय उन्हें वस्त्रालंकारों से सुशोभित करने की पद्धति है। दीपावली में श्री लक्ष्मीपूजन के समय अलंकार धारण करने हेतु देवी से प्रार्थना करते हैं। उस समय निम्नांकित श्लोक का पाठ किया जाता है।
रत्नकंकणकेयूरकांचीकुण्डलनूपुरम्। मुक्ताहारं किरीटं च गृहाणाभरणानिमे।।
अर्थ : हे देवी, रत्नजडित कंगन, केयूर अर्थात बाहुबंद, करधनी, कर्णाभूषण, पायल, मोतियों का हार, मुकुट इत्यादि अलंकार धारण करें।
अलंकारों के माध्यम से देवताओं का चैतन्य ग्रहण कर पाना - अलंकार अर्थात ईश्वरीय तत्त्व ग्रहण कर जीव को उसका लाभ करवाने वाला प्रणेता। अलंकार धारण करने से देह द्वारा देवताओं की चैतन्यदायी उर्जाशक्ति का स्रोत ग्रहण होता है तथा जीव को कार्य करने की गति मिलती है। अलंकार धारण करने से सगुण चैतन्य ग्रहण करना तथा इस चैतन्य को देह के अलंकारों के माध्यम से घनीभूत कर, उसका प्रक्षेपण आवश्यकतानुसार अल्पावधि में करना संभव होता है।शरीर के विशिष्ट भाग पर विशिष्ट अलंकार धारण करना अर्थात सगुणत्व के माध्यम से ब्रह्मांड मंडल में विशिष्ट समय पर कार्यरत देवता का तेज रूपी चैतन्य ग्रहण करना सरल होना। अलंकार शरीर के सौंदर्य के कारण नहीं, अपितु ईश्वर से मनुष्य के शरीर को प्राप्त चैतन्य के कारण ही सुशोभित होते हैं।
त्योहार एवं धार्मिक विधि के दिन और शुभ दिन पर नए अथवा रेशमी वस्त्र एवं विविध अलंकार धारण करने से देवताओं की तरंगें ग्रहण कर पाना- त्योहार तथा धार्मिक विधि के दिन तथा शुभदिन पर कभी-कभी देवता सूक्ष्म रूप से भूतल पर आते हैं। उस दिन व्यक्ति का वस्त्रालंकारों से सुशोभित होना, उसके द्वारा देवताओं के आगमन का स्वागत करने के समान है। इससे देवता प्रसन्न होकर आशीर्वाद देते हैं और व्यक्ति देवताओं की तरंगें ग्रहण कर पाता है।