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बड़ा खास है यह दिन धरती पर यहां मिलेंगे देवता और पितर

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पितरों से संबंधित सभी श्राद्ध-तर्पण आदि कार्य अमावस्या तक और सकाम अनुष्ठान या बड़े यज्ञ आदि कार्य शुक्लपक्ष की पूर्णिमा तक किए जाते हैं। इन सभी युतियों में माघ माह में सूर्य एवं चन्द्र का मिलन सर्वश्रेष्ठ माना गया है।
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शास्त्रों के अनुसार इस दौरान सभी देवी देवता प्रयाग तीर्थ में इकट्ठे होते हैं माघ की अमावस्या के दिन यहां पितृलोक के सभी पितृदेव भी आते हैं। अतः यह दिन पृथ्वी पर देवों एवं पितरों के संगम के रूप में मानाया जाता हैं। यह अमावस्या इस वर्ष 20 जनवरी को है।

इस महा-पुण्यदायक दिन में मौनव्रत रखने का विधान है, इसलिए इसे मौनी अमावस्या भी कहा जाता है। इस अमावस्या के विषय में कहा गया है कि इसदिन मन, कर्म, तथा वाणी के जरिए किसी के लिए अशुभ नहीं सोचना चाहिए।
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केवल बंद होठों से उपांशु क्रिया के जरिए ॐ नमो भगवते वासुदेवाय, ॐ खखोल्काय नमः ॐ नमः शिवाय मंत्र पढ़ते हुए अर्घ्य आदि देना चाहिए।
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मौनी अमावस्या में संगम स्नान का महत्व

समुद्र मंथन में प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक में जहां-जहां भी अमृत की बूंदें गिरी थीं उन-उन स्थानों पर यदि मौनी अमावस्या के दिन जप-तप, स्नान आदि किया जाए तो और भी पुण्यप्रद होता है। यदि कहीं जाना संभव न हो तो घर में ही प्रात:काल दैनिक कर्मों से निवृत होकर स्नान जप करें।

इस दिन पुण्य काम करें। सतयुगमें में तप से, द्वापर में श्रीहरि की भक्ति से, त्रेता में ब्रह्मज्ञान और कलियुग में दान से मिले हुए पुण्य के बराबर माघ मास की मौनी अमावस्या में केवल किसी भी संगम में स्नान दान से भी उतना ही पुण्य मिल जाता है।

इस दिन स्नान के बाद अपने सामर्थ्य के अनुसार अन्न, वस्त्र, धन आदि का दान देना चाहिए। इस दिन तिल दान भी उत्तम कहा गया है।

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