समर्थ रामदास कथा कह रहे थे। उन्होंने कहा कि राम लंका पर विजय प्राप्त कर माता सीता को साथ लेकर लौट रहे थे। पुष्पक विमान से अयोध्या लौटने की घटना तो बहुत बाद की हैं। संतों और ज्ञानीजनों का कहना है कि इससे पहले राम युद्ध से संबंद्ध जगहों पर भी माता सीता को ले गए।
इस क्रम में वे रामसेतु पर भी गए। सेतु पर पहुंच कर राम एक ही दिशा में निहारने लगे। उन्हें निहारते देख सीता ने पूछा, आप एकाग्रता से क्या देख रहे हैं? राम ने तट की ओर इशारा करते हुए कहा, मैं उस स्थान की रेत को देख रहा हूं, जहां बलिदान न दिया गया होता, तो रावण को परास्त करना कठिन था।
सीता अवाक-सी राम का मुंह देखती रही। राम ने कहा, वहां एक गिलहरी अंतिम क्षण तक लंका विजय अभियान में अपना योगदान देती रही। सीता की आंखों के सामने वह दृश्य साकार हो उठा। उन्होंने देखा कि एक गिलहरी बार-बार समुद्र के किनारे जाती है और रेत पर लोटपोट कर उसके कण अपने शरीर पर चिपका लेती है। जब रेत उसके शरीर पर चिपक जाता है, तो वह सेतु पर जाकर अपना सारे कण झाड़ आती है। देर तक वह यही सब करती रही। इसी तरह उद्यम करते हुए गिलहरी ने अपने प्राण दे दिए।
सीता ने पूछा, गिलहरी के इस तरह प्राण देने में नया क्या है? सीता ने देखा कि राम उस गिलहरी के पास गए हैं। उससे पूछ रहे हैं, तुमने यह व्यर्थ श्रम क्यों किया? प्राण त्यागती हुई उस गिलहरी ने कहा, भगवन, बस इस पुण्य कार्य में थोड़ा-बहुत योगदान दे रही हूं।
मैं तो सिर्फ यह चाहती हूं कि धर्म की अधर्म पर जीत के इस कार्य में मैं निरपेक्ष न रहूं। कहते हुए गिलहरी ने प्राण त्याग दिए। सीता की आंखों के आगे ये सारे दृश्य तैर गए और उन्होंने अनुभव किया कि वह भी गिलहरी के शरीर पर प्यार से हाथ फेर रही हैं।