आमतौर पर यह माना जाता है कि अच्छे कामों के लिए सभी समय, मुहूर्त और घड़ी शुभ हैं। पर व्यवहार में ग्रह-नक्षत्रों के संयोग से बना कोई समय या दिन चुनने का रिवाज है। अक्षय तृतीया उन दिनों में एक है, जब किसी तरह का लगन-मुहूर्त तलाशना जरूरी नहीं होता।
इस तिथि का हर पल स्वयंसिद्ध मुहूर्त हैं। इस दिन किए गए दान पुण्य, जप, होम आदि के फल अक्षय होते हैं। उनका कभी अंत नहीं होता। शास्त्रों में तीन स्वयंसिद्ध मुहूर्त और भी हैं, लेकिन अक्षय तृतीया के साथ सतयुग और त्रेता शुरू होने, विष्णु के चौबीस में से तीन अवतार परशुराम, नर-नारायण और हयग्रीव के धरती पर आने, बद्रीनारायण के कपाट खुलने और वृंदावन में बांके बिहारी के चरण दर्शन होने जैसे संदर्भ भी जुड़े हैं।
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एक और बड़ा कारण है कि जिन वर-वधुओं के विवाह का पूरे वर्ष कोई लगन मुहूर्त नहीं मिलता, वे इस दिन उसकी चिंता किए बिना सात जन्मों के बंधन में बंध सकते हैं। अध्यात्म क्षेत्र का नियम है कि एक साथ कई लोगों के पुण्यकार्यों मे लगने से आसपास के समाज में सतोगुणी प्रभाव होते हैं।
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आबादी का पांच प्रतिशत हिस्सा भी ऐसे धार्मिक कार्यों में लग सके, तो उस इलाके में अनीति अमंगल की स्थितियां टलने लगती हैं। वर्ष में एक दिन भी पुण्य कार्य में लगे, तो समाज का सांस्कृतिक आधार मजबूत होता है। दिनों की संख्या और बढ़ाई जा सके, तो उसके प्रभाव और भी अच्छे होंगे।