किसी गांव में स्वामी रामानंद नाम के एक महात्मा रहते थे। लोग उनके पास अपनी कठिनाइयां लेकर आते थे और महात्मा उन्हें कोई न कोई समाधान सुझाते थे। एक दिन विराज नाम का एक साहूकार युवक आया और महात्मा से पूछने लगा, गुरुदेव मैं हमेशा खुश रहने का राज जानना चाहता हूं। महात्मा ने सिर्फ यह कहा कि तुम मेरे साथ जंगल में चलो, वहां मैं तुम्हें खुश रहने का राज बताऊंगा।
यह कहकर महात्मा और विराज, दोनों जंगल की तरफ चलने लगे। रास्ते में महात्मा ने एक बड़ा-सा पत्थर उठाया और उसे विराज को देते हुए कहा कि इसे पकड़ो और चलो। विराज ने पत्थर उठाया और वह महात्मा के साथ-साथ जंगल की तरफ चलने लगा।
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कुछ समय बाद विराज के हाथ में दर्द होने लगा, लेकिन वह चुपचाप चलता रहा। कोई खास वजन नहीं था। लेकिन चलते हुए थोड़ा समय बीत गया और विराज से दर्द सहा नहीं गया, तो उसने महात्मा से कहा। सुनकर उन्होंने कहा, अगर दर्द हो रहा है, तो इस पत्थर को नीचे रख दो।पत्थर को नीचे रखने पर उस विराज को बड़ी राहत महसूस हुई।
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तभी महात्मा ने कहा, यही है खुश रहने का राज। विराज ने कहा, मैं समझा नहीं। इस पर महात्मा का जवाब था, जिस तरह इस पत्थर को एक मिनट तक हाथ में रखने पर थोड़ा-सा दर्द होता है, उसी तरह दुखों के बोझ को ज्यादा समय तक उठाए रखने पर हम ज्यादा दुखी और निराश रहेंगे। यह हम पर निर्भर करता है कि हम दुखों के बोझ को एक मिनट तक उठाए रखते हैं या जिंदगी भर।