क्षत्रियों में विजयादशमी के दिन आखेट करने की प्रथा थी। मेवाड़ के राणा प्रताप तथा उनके छोटे भाई शक्त सिंह सैनिकों के साथ इस तिथि को आखेट के लिए निकले। दोनों भाई साथ ही आखेट कर रहे थे। संयोगवश एक मृग दोनों की दृष्टि में एक साथ पड़ा। दोनों ने उस पर साथ ही बाण चलाया।
मृग तो बाण के आघात से मर गया, मगर एक विवाद उठ खड़ा हुआ कि मृग मरा किसके बाण से। राणा कह रहे थे, मेरे बाण से मरा। शक्त सिंह कह रहे थे, मैंने इसे मारा है। यह छोटी-सी बात इतनी बढ़ गई कि दोनों भाइयों ने तलवार खींच ली। दोनों में युद्ध छिड़ गया।
राजपुरोहित ने दूर से ही दोनों को पुकारकर रोका, ठहरो, युद्ध बंद करो। और वह दौड़ते हुए वहां पहुंचे। दोनों को उन्होंने समझाया, देश इस समय संकट में है। विधर्मियों के आक्रमण आए दिन होते ही रहते हैं। ऐसे समय यह कैसी मूर्खता है कि मेवाड़ की आशा के दो आधार परस्पर ही लड़ मरने को उद्यत हैं।
ब्राह्मण ने राणा को समझाया कि शक्त सिंह को बालक समझकर उसी को विजयी मान लें। शक्त सिंह को समझाया कि वह बड़े भाई का सम्मान करें, किंतु क्रोध में अच्छे विचारवान भी विवेकशून्य हो जाते हैं। दोनों में कोई झुकने को तैयार नहीं हुआ।
जब कोई उपाय नहीं रहा, तो राजपुरोहित नंगी तलवार लिए दोनों भाइयों के बीच खड़े होकर बोले, यदि रक्तपान के बिना तुम्हारा क्रोधरूपी पिशाच शांत नहीं होता, तो वह ब्राह्मण का रक्त पिए। मैंने मेवाड़ का अन्न खाया है, मैं मेवाड़ को गृह-कलह से नष्ट होते नहीं देख सकता।
और यह कहकर ब्राह्मण ने कटार अपनी छाती में घोंप ली। दोनों भाइयों के बीच में उनका शरीर भूमि पर गिर पड़ा। दोनों भाइयों के मस्तक लज्जा से झुक गए।