यह उस समय की बात है, जब देश की आजादी के समय कोलकाता में दंगे भड़के हुए थे। तमाम प्रयासों के बावजूद लोग शांत नहीं हो रहे थे। वैसी स्थिति में गांधी जी वहां पहुंचे और एक मुस्लिम मित्र के यहां ठहरे। उनके पहुंचने से दंगा कुछ शांत जरूर हुआ, लेकिन कुछ ही दिनों में फिर से सांप्रदायिकता की आग भड़क उठी।
तब गांधी जी ने आमरण अनशन करने का निर्णय लिया और आजादी मिलने के सोलह दिन बाद ही अनशन पर बैठे। उस दौरान एक दिन एक अधेड़ उम्र का आदमी उनके पास पहुंचा और बोला, मैं तुम्हारी मृत्यु का पाप अपने सिर पर नहीं लेना चाहता। लो, रोटी खा लो। यह कहकर वह व्यक्ति अचानक ही रोने लगा, मैं मरूंगा, तो नर्क जाऊंगा!
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गांधी जी ने विनम्रता से पूछा कि ऐसा क्या हुआ है? उस व्यक्ति ने कहा, क्योंकि मैंने एक आठ साल के मुस्लिम लड़के की जान ले ली। इसका पश्चाताप मुझे सता रहा है।
तुमने उसे क्यों मारा? गांधी जी ने पूछा। वह आदमी रोते हुए बोला, क्योंकि उसके समुदाय के लोगों ने मेरे मासूम बच्चे को जान से मार दिया। इसलिए आवेश में मैंने भी ऐसा घृणित काम किया।
उसकी बातें सुनकर गांधी जी सोच में पड़ गए। कुछ क्षण चुप रहने के बाद उन्होंने कहा, मेरे पास एक उपाय है। वह व्यक्ति आश्चर्य से उनकी तरफ देखने लगा। गांधी जी ने कहा, उसी उम्र का एक लड़का खोजो, जिसने दंगे में अपने माता-पिता खो दिए हों, और उसे अपने बच्चे की तरह पालो।
लेकिन एक चीज सुनिश्चित कर लो कि वह लड़का मुस्लिम ही होना चाहिए और एक मुस्लिम की तरह बड़ा किया जाना चाहिए। गांधी जी ने कहा और चुपचाप उस व्यक्ति की ओर देखने लगे। उसे अपने पापों के प्रायश्चित का उपाय मिल गया।