राजकुमार वसुसेन राजा बनने वाले थे। परंपरा के अनुसार राजा बनने से पहले उनका विवाह आवश्यक था। मंत्री ने सलाह दी कि वह राज्य की सभी विवाह योग्य युवतियों को बुलाकर उनमें से सुयोग्य वधु चुने। महल में काम करने वाली एक स्त्री की पुत्री वसुसेन से बहुत प्रेम करती थी।
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स्वयंवर की खबर सुनकर वह भी राजमहल जाने की जिद करने लगी। मां ने बेटी को समझाया कि वसुसेन का विचार ही मन से निकाल दे। मगर उसने कहा, मां, मुझे पता है कि वसुसेन मुझे नहीं चुनेंगे, पर इसी बहाने मुझे कुछ समय उनके पास रहने का मौका मिलेगा।
स्वयंवर के दौरान महल में सुंदर और धनी युवतियों का जमघट लगा। वसुसेन ने कहा, मैं प्रत्येक युवती को एक बीज दूंगा। इस बीज से पौधा निकलने के छह महीने बाद जो मुझे सबसे सुंदर फूल लाकर देगी, मैं उसी से विवाह करूंगा। सभी युवतियों को गमले में बीज रोपकर दे दिया गया।
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महल की दासी की पुत्री ने भी बहुत लगन से गमले की देखभाल की। उसने दिन-रात एक कर दिया, लेकिन गमले में कोई पौधा नहीं उगा। छह महीने बाद वह अपने खाली गमले को लेकर राजमहल पहुंची। उसने देखा कि बाकी युवतियों के गमलों में बहुत अच्छे, सुंदर फूल खिले थे।
जब परिणाम के घोषणा की बारी आई, तो वसुसेन ने दासी की पुत्री को ही चुना। उपस्थित लोगों ने ऐतराज किया कि सुंदर फूल लेकर आई युवतियों की उपेक्षा हुई है, तो वसुसेन ने शांतिपूर्वक कहा, केवल यही युवती रानी बनने की योग्यता रखती है, क्योंकि इसने सच्चाई और ईमानदारी का फूल खिलाया है। जो बीज मैंने छह महीने पहले सभी युवतियों को दिए थे, वे निर्जीव थे। उनसे पौधा उगकर फूल खिलना असंभव था।