गुरु नानकदेव जी महाराज के पास एक जिज्ञासु पहुंचा। उसने पूछा, बाबा, भगवान से साक्षात्कार के लिए कोई भक्ति करने को कहता है, तो कोई ज्ञान को साधन बताता है। कोई तपस्या करने की बात कहता है, तो कोई एकांतवास को इसका साधन बताता है। आपकी दृष्टि में असली साधन क्या है?
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गुरु जी ने कहा, अहंकार, पाखंड और आडंबर से दूर रहकर किसी भी साधन से ईश्वर की आराधना करके उसे पाया जा सकता है। निश्छल मन और पवित्र हृदय से की गई भक्ति स्वतः सफल होती है। ईश्वर के प्रति दृढ़ आस्था रखते हुए, सत्य पर अचल रहने और उनके नाम का स्मरण करने से उसे सहज ही पाया जा सकता है। उन्होंने आगे कहा, साहिब मेरा एको है, एको है भाई। यानी मेरा ईश्वर एक है। उन्होंने पग-पग पर ओंकार की उपासना पर बल दिया।
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गुरु जी अपने उपदेश में अक्सर कहा करते थे कि अहंकार चाहे जाति का हो या धन का, पद का हो या ज्ञान का- वह मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है। अहंकारी व्यक्ति का एक-न-एक दिन पतन अवश्य होता है। इसलिए आदमी को अपनी विनम्रता का परिचय देना चाहिए। उनका कहना था, ईश्वर ही सत्य है। वह भयरहित और जन्म-मरण के बंधनों से मुक्त है।
वह कहा करते थे, किसी भी रोगी से घृणा न करके उसके प्रति दयावान बनना चाहिए। वह सभी को एक समान मानते थे और सभी के प्रति दया की भावना रखने का उपदेश दिया करते थे।
गुरु नानकदेव जी ने पूरे देश में जाकर सदाचार और नाम-भक्ति का प्रचार किया। तीर्थों में जाकर वह श्रद्धालुओं को अंधविश्वास और गलत मान्यताओं को त्यागने की प्रेरणा देते थे। आज पूरा संसार उनके उपदेशों से प्रेरणा ले रहा है।