संबोधि के बाद बुद्ध वाराणसी चले आए। उन्होंने चारिका-विचरण के लिए उरूबल वन में प्रवेश किया और एक घने वृक्ष की छाया में पद्मासन लगाकर बैठ गए। तभी किसी की खोजबीन करते लोगों की आहट और बोलने की आवाजें सुनाई दी।
किसी ने कहा,‘वह इधर ही गई होगी। कितनी नीच है वह?’ दूसरा स्वर सुनाई दिया ‘पर वह इस वन खंड से भागकर जाएगी कहां? कितने अमूल्य थे हमारे रत्नाभरण।’ दूसरे ने एक वृक्ष की छाया में ठहरकर संतोष की सांस ली। दूसरे साथी आ गए।
‘हम उरूबल का कोना-कोना छान मारेंगे। वेश्या का विश्वास करने वाला धोखा खाता ही है।’ वन में प्रवेश करते ही उन्हें बुद्ध के दर्शन हुए। दिव्य पुरुष समझ उनकी चरण धूलि मस्तक पर चढ़ाई। फिर पूछा, ‘आपने उसको इधर से जाते देखा है?’
‘मुझे अपने-आपके सिवा दूसरा दीख ही नहीं रहा है।’
‘भंते! हमारा आशय एक स्त्री से है। वह वेश्या है। हमलोग अपनी-अपनी पत्नियों के साथ वन-विहार करने आए थे। पत्नी के अभाव में एक मित्र के मनोरजंन के लिए वह हमारे साथ थी। हमें विशेष राग-रंग में लिप्त देखकर हमारे कीमती रत्नालंकार आदि लेकर वह इसी वन खंड में अदृश्य हो गई है हमें उसी की खोज है।’ ‘भद्रे! जगत के विषय-भोग और सुख नश्वर हैं।
रत्नालंकार आदि तो आते-जाते रहते हैं। स्त्री की खोज से कहीं अधिक सत्य आत्मा की खोज आवश्यक है।’ भगवान् बुद्ध ने धर्मचक्षु जाग्रत किया। अपनी शीतल मुस्कान बिखेर दी। मुस्कान उन मित्रों को अभिभूत कर गई। कुछ इस तरह कि वे गणिका को खोजना भूल गए और कहने लगे, ‘भंते! हमे स्त्री की आवश्यकता नहीं है, आत्मा की खोज करनी है।’ भद्रवर्गीयों ने भगवान से प्रव्रज्या उपसंपदा की याचना की।