मिथिला के राजा नेमि हमेशा भोग-विलास में आसक्त रहते थे। भोग के अतिरेक से दाह ज्वर का ऐसा भयंकर कालकूट फूट निकला कि वह रात-दिन नेमि की देह को सालता रहता। नेमि के जीवन का सुख अब धीरे-धीरे जीवन-भार में परिणत हो गया-सर्वत्र दुख और दर्द की दुनिया।
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राजा की हालत देखकर वैद्यराज ने वामन चंदन के लेप का आदेश दिया। इस पर तुरंत अमल किया गया। चंदन घिसने और लेप करने का काम राजरानियों ने अपने हाथ में ही रखा। नेमि के प्रति रानियों के मन में बहुत गहरा अनुराग था। चंदन घिसते समय चूड़ियों के मिलने और आपस में टकराने से शोर होता था। चूड़ियां खनकतीं और उनकी खनक से आवाज होती।
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आवाज मधुर संगीत-सी लगती, लेकिन बीमार नेमि को चूड़ियों की वह खनक भी कोलाहल जैसी लग रही थी। नेमि के परिचारकों ने उस कोलाहल को रोकने के लिए कहा, ताकि राजा को सुख-चैन मिले। परिचारकों के कहने पर रानियों ने सौभाग्य की सूचक एक-एक चूड़ी रखकर अपना काम चालू रखा।
अब काम होते भी, तो कोलाहल नहीं था। वातावरण में शांति थी। नेमि ने पूछा-‘क्या चंदन नहीं घिसा जा रहा है? उत्तर मिला-घिसा तो जा रहा है, परंतु हर रानी के हाथ में एक-एक चूड़ी होने से संघर्षणजन्य ध्वनि नहीं निकल पा रही है।
नेमि की अंतश्चेतना जागी। वह हृदय के अंतस्तल में उतरकर सोचने लगा-एकत्व में ही वास्तविक सुख का अधिष्ठान है। एकत्व भावना का विचार करने के दौरान उनमें वैराग्य आविर्भूत हुआ, जिसे पाकर नेमि एक पल भी राजप्रासाद में न रह सके। वह आत्म-साधना के पथ पर चल पड़े। भोग का सम्राट योग का साधक बनकर आत्मभाव से भावित बन गया।