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आकांक्षा हो तो सपना भी सिखा देता है ज्ञान

Thu, 29 May 2014 03:37 PM IST
योगवसिष्ठ
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जनक ने एक रात स्वप्न देखा कि मिथिला पर किसी ने आक्रमण कर दिया है। मिथिला की सेना हार गई और जनक बंदी बना लिए गए। आक्रमणकारी राजा ने जनक के सब वस्त्राभूषण उतारकर राज्य के बाहर निकाल दिया। जनक को कई दिनों तक अन्न का एक दाना भी नहीं मिला। भूख-प्यास से उनका बुरा हाल हो गया।
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राज्य की सीमा से बाहर एक नगर मिला। वहां भूखों को खिचड़ी दी जा रही थी। जनक वहां पहुंचे, तब तक खिचड़ी बंट चुकी थी। भूख से व्याकुल जनक की आंखों से आंसू बहने लगे। वहां के कर्मचारी ने कहा, खिचड़ी तो है नहीं; बर्तन में कुछ खुरचन लगी है। कहो तो वही दे दूं। जनक ने उसी के लिए हाथ फैला दिए। कर्मचारी ने खुरचन हाथ पर रखी थी कि चील ने झपट्टा मारा और खुरचन नीचे गिर पड़ी। मारे व्यथा के जनक चीख उठे।

यहां तक तो स्वप्न था; किंतु सपना देखते हुए जनक की सचमुच चीख निकल गई थी। चीख सुनकर राजमहल के अधिकारी, सेवक, रानियां आदि जनक के आसपास जमा हो गए। ऋषि अष्टावक्र भी आए। उन्होंने सारा हाल जानकर कहा, अब तो सब ठीक है न। जनक बोले, मैं तो ठीक हूं, पर समझ नहीं आ रहा कि सच क्या है? जो सपने में देखा, वह या अभी जो देख रहा हूं वह? असल में, जनक को बोध हो रहा था कि स्थितियां बदलती रहती हैं, पर जो मनुष्य उन्हें देखता-अनुभव करता है, वही सत्य है।
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