अवधूत दत्तात्रेय एक दिन नदी किनारे टहल रहे थे। उन्होंने देखा कि एक मछुआरा नदी के तट पर बैठा लोहे के छोटे से कांटे पर मांस का टुकड़ा लगा रहा है।
दत्तात्रेय ने उससे इसका कारण पूछा, तो वह बोला, मैं मांस का टुकड़ा लगाकर उसे पानी में छोड़ूंगा। मांस के लालच में मछलियां कांटे पर झपटेंगी। इस क्रम में उसका मुंह लोहे के कांटे से बिंध जाएगा, फिर मैं उसे पकड़ लूंगा।
दत्तात्रेय जी ने उससे सवाल पूछा, भैया, यदि मछली ने मांस का टुकड़ा निगलकर कांटा उगल दिया, तो वह कैसे फंसेगी?
मछुआरे ने जवाब दिया, बाबा, क्या इतना भी नहीं जानते कि विषयों को निगलना सरल है, पर उगलना कठिन?
दत्तात्रेय जी को शास्त्र वचन याद आ गया कि प्राणी जब एक बार लोभ-लालच, मोह-ममता आदि में फंस जाता है, तो फिर दुख-पर दुख भोगने को मजबूर हो जाता है। वह सांसारिक सुखों से मुक्ति का रास्ता नहीं खोज पाता और विषय भोग की तृष्णा में जीवन बेकार चला जाता है।
तीर्थंकर महावीर ने कहा था, जो विषय-भोगों में एक बार रम जाता है, उन्हें त्यागना उसके लिए दूभर हो जाता है। अतः यह जान लेना चाहिए कि सांसारिक सुखों का आकर्षण असल में दुख का कारण है।
भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं, सांसारिक मोह के कारण ही मनुष्य दुविधा में फंसकर कर्तव्यों से विमुख हो जाता है। इसलिए सांसारिक सुखों के वशीभूत कदापि नहीं होना चाहिए।